शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः । १७३
ब्राह्मं तेजो बुद्धिमत्सु क्षात्रं राज्ञि प्रतिष्ठितम् । आरादेव सदा चास्ति तिष्ठन् दूरेऽपि बुद्धिमान् ॥ २८२ ॥ बुद्धिपाशैर्बन्धयित्वा सन्ताडयति कर्षति । समीपस्थोऽपि दूरेऽस्ति ह्यप्रत्यक्षसहायवान् ॥ २८३ ॥
दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश — बुद्धिमान व्यक्तियों में ब्राह्मण-सम्बन्धी तेज तथा राजा में क्षत्रिय-सम्बन्धी तेज स्थापित है। अतः बुद्धिमान लोग दूर रहते हुये भी सदा समीप में ही रहने के समान हैं। और वह बुद्धिरूपी रस्सी से राजा या शत्रु को बांधकर अच्छी तरह से उसको पीटता है और अपने पास खींच लेता है। एवं छिपकर अपने साथियों के साथ समीप में रहता हुआ दूर रहने के समान है।
नानुवाकहता बुद्धिर्व्यवहारक्षमा भवेत् । अनुवाकहता या तु न सा सर्वत्र गामिनी ॥ २८४ ॥
वेदादि के पण्डितों का विना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश— अनुवाक (वेद का एक विभाग विशेष) की आलोचना करने से मारी गई बुद्धि लौकिक व्यवहार समझने में समर्थ नहीं होती है क्योंकि वह अनुवाक से मारी हुई होने से सर्वत्र घुसने वाली नहीं होती। अर्थात् वेदादि के पण्डित बिना नीतिशास्त्र के लोकव्यवहार में चतुर नहीं हो सकते हैं।
आदौ वरं निर्धनत्वं धनिकत्वमनन्तरम् । तथादौ पादगमनं यानगत्वमनन्तरम् ॥ २८५ ॥ सुखाय कल्पते नित्यं दुःखाय विपरीतकम् ।
प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश— पहले दरिद्र होना पीछे धनी होना एवं पहले पैदल चलना बाद में सवारी पर चढ़ना अच्छा होता है क्योंकि इससे सुख मिलता है और यदि इससे विपरीत हो तो दुःख होता है।
वरं हि त्वनपत्यत्वं मृतापत्यवतः सदा ॥ २८६ ॥ दुष्टयानात्पादगमो ह्यौदासीन्यं विरोधतः ।
**मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश—**सन्तान होकर मर जाने की अपेक्षा निःसन्तान रहना, दुष्ट घोड़े आदि की सवारी से पैदल चलना और झगड़ा करने से तटस्थ (उदासीन) बना रहना अच्छा होता है।
वरं देशाच्छादनतश्चर्मणा पादगूहनम् ॥ २८७ ॥ ज्ञानलवदौर्विदग्ध्यादज्ञता प्रवरा मता ।
चलने-फिरने के प्रदेश को चमड़े से ढंक देने की अपेक्षा चमड़े का जूता