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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 309 of 526

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Page 309

चतुर्थाध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२३

तत्तत्सांकर्यासांकर्यात् प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ११ ॥
जात्यानन्त्यं तु सम्प्राप्तं तद्वक्तुं नैव शक्यते ।

**मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश—**पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने कर्म के अनुसार मानव की ४ जातियां बनाईं। उनमें प्रत्येक जातियों का सांकर्य (मिलावट) होने पर उन संकीर्ण (मिश्रित) जातियों का भी सांकर्य अनुलोम (पिता उच्च वर्ण-माता नीच वर्ण) और प्रतिलोम (पिता नीच वर्ण-माता उच्च वर्ण) रूप से होने से असंख्य जातियां हो गई जिनका वर्णन करना अशक्य है ।

मन्यन्ते जातिभेदं ये मनुष्याणां तु जन्मना ॥ १२ ॥
त एव हि विजानन्ति पार्थक्यं नामकर्मभिः ।

जो लोग पूर्व कर्मानुसार जिस जाति में मनुष्य जन्म ले उसकी वही जाति मानते हैं, वे ही लोग नाम तथा कर्म से जाति-भेद मानते हैं, अन्य लोग नहीं मानते हैं ।

जरायुजाण्डजाः स्वेदोज्भिज्जा जातिः सुसंग्रहात् ॥ १३ ॥

**जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश—**जरायुज (मनुष्यादि), अण्डज (पक्षी आदि), स्वेदज (जूंआ आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि) ये ४ प्रकार के प्राणियों की जातियां हैं ।

उत्तमो नीचसंसर्गाद्भवेन्नीचस्तु जन्मना ।
नीचो भवेन्नोत्तमस्तु संसर्गाद्वाऽपि जन्मना ॥ १४ ॥

जन्म से उत्तम वर्ण का मनुष्य संसर्गवश नीच हो जाता है किन्तु जन्म से नीच वर्ण का मनुष्य संसर्गवश उत्तम नहीं हो सकता है ।

कर्मणोत्तमनीचत्वं कालतस्तु भवेद् गुणैः ।
विद्याकलाश्रयेणैव तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ १५ ॥

कर्म के द्वारा मनुष्य तत्काल उत्तम तथा नीच कहलाने लगता है । किन्तु गुणों के द्वारा कुछ काल के बाद उत्तम या नीच माना जाता है और विद्या तथा कला के आश्रय से भी उसके नामानुसार अनेक जातियों की कल्पना की गई है ।

इज्याध्ययनदानानि कर्माणि तु द्विजन्मनाम् ।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च याजनं ब्राह्मणेऽधिकम् ॥ १६ ॥

**द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश—**यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना ये ३ कर्म द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) मात्र के हैं किन्तु ब्राह्मणों के लिये यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना, दान लेना ये ३ कर्म जीविका के लिये अधिक हैं ।