शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context२३० शुक्रनीतिः
आश्रमों के धर्मों का स्मरण (वर्णन) तथा अर्थशास्त्र का भलीभांति प्रतिपादन किया गया हो, उसे 'स्मृति' कहते हैं।
युक्तिर्बलीयसी यत्र सर्वं स्वाभाविकं मतम् ॥ ५४ ॥
कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता न वेदो नास्तिकं हि तत् ।
नास्तिक मत लक्षण— जिसमें युक्ति (तर्क) को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना गया हो एवं प्रत्येक वस्तु की सृष्टि स्वभावतः उत्पन्न हुई मानी जाय। और ईश्वर को जगत् का कर्त्ता तथा वेद दोनों को भी न माना जाय। उसे 'नास्तिकमत' कहते हैं।
श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादि-शासनम् ॥ ५५ ॥
सुयुक्त्याऽर्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते ।
अर्थशास्त्र लक्षण— जिसमें श्रुति तथा स्मृति के अविरुद्ध (संभव) राजाओं के लिये आचरण के विषय में उपदेश किया गया हो तथा अच्छे कौशल से धन अर्जन करने की विधि कही गई हो, उसे 'अर्थशास्त्र' कहते हैं।
शशादिभेदतः पुंसामनुकूलादिभेदतः ॥ ५६ ॥
पद्मिन्यादिप्रभेदेन स्त्रीणां स्वीयादिभेदतः ।
तत्कामशास्त्रं सत्त्वादेर्लग्नं यत्रास्ति चोभयोः ॥ ५७ ॥
कामशास्त्र लक्षण— जिसमें पुरुषों के शश, मृग, अश्व, हस्ती रूप से जातिभेद तथा अनुकूल, धृष्ट, शठ आदि नायक-भेद एवं स्त्रियों के पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी तथा हस्तिनी रूप से जातिभेद तथा स्वीया, परकीया, वेश्या आदि-नायिकाभेद एवं दोनों (स्त्री तथा पुरुष) के अनुरागादि के लक्षण विशेष रूप से वर्णित हों उसे 'कामशास्त्र' कहते हैं।
प्रासादप्रतिमाराम-गृहवाप्यादिसंस्कृतिः ।
कथिता यत्र तच्छिल्पशास्त्रमुक्तं महर्षिभिः ॥ ५८ ॥
शिल्पशास्त्र लक्षण— जिसमें प्रासाद (राजभवन-देवमन्दिर), प्रतिमा (मूर्ति), उद्यान गृह, बावली आदि का सुन्दर रीति से निर्माण तथा संस्कार करने की विधि वर्णित हो उसे महर्षियों ने 'शिल्पशास्त्र' कहा है।
समन्यूनाधिकत्वेन सारूप्यादिप्रभेदतः ।
अन्योन्यगुणभूषा तु वर्ण्यतेऽलङ्कृतिश्च सा ॥ ५९ ॥
अलङ्कार शास्त्र लक्षण— जिसमें समता, न्यूनता तथा अधिकता और सादृश्य आदि भेद से परस्पर शब्द तथा अर्थ के गुणों के वैचित्र्य रूप 'अलङ्कृति' (अलङ्कार) का वर्णन हो उसे 'अलङ्कारशास्त्र' कहते हैं।
सरसालङ्कृतादुष्ट-शब्दार्थं काव्यमेव तत् ।
विलक्षणचमत्कारबीजं पद्यादिभेदतः ॥ ६० ॥