शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४९
मानतो नाधिकं हीनं तद्विम्बं रम्यमुच्यते ॥ ७८ ॥
देवताओं की प्रतिमा शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न हीन होने पर ही रम्य और कल्याणकारक होती हैं।
अपि श्रेयस्करं नृणां देवबिम्बमलक्षणम् ।
सलक्षणं मर्त्यबिम्बं न हि श्रेयस्करं सदा ॥ ७६ ॥
और देवता की प्रतिमा यदि शास्त्रोक्त लक्षणों से रहित भी हो तो मनुष्यों के लिये कल्याणकारक होती है और यदि मनुष्य की प्रतिमा लक्षणों से युक्त भी हो तो सदा ही कल्याणकारक नहीं होती है।
सात्त्विकी राजसी देवप्रतिमा तामसी त्रिधा ।
विष्ण्वादीनां च या यत्र योग्या पूज्या तु तादृशी ॥ ८० ॥
**सात्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश—**विष्णु आदि देवता १. सात्विकी, २. राजसी, ३. तामसी इन भेदों से ३ प्रकार की होती है। और जहां पर जैसी योग्य हो वहां पर वैसी प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये।
योगमुद्रान्विता स्वस्था वराभयकरान्विता ।
देवेन्द्रादिस्तुतनुता सात्त्विकी सा प्रकीर्तिता ॥ ८१ ॥
**सात्विकी प्रतिमा के लक्षण—**जो प्रतिमा योगमुद्रा से युक्त, स्वाभाविक अवस्था में स्थित, वरदान तथा अभय दान देनेवाली मुद्रा से युक्त हाथोंवाली है, एवं इन्द्रादि देवता जिसकी स्तुति तथा नमन कर रहे हैं, वह 'सात्विकी' कहलाती है।
तिष्ठन्ती वाहनस्था वा नानाभरणभूषिता ।
या शस्त्रास्त्राभयवर-करा सा राजसी स्मृता ॥ ८२ ॥
**राजसी प्रतिमा के लक्षण—**जो प्रतिमा किसी वाहन पर बैठी हुई तथा नाना आभूषणों से युक्त होती है एवं जिसके हाथों में शस्त्र, अस्त्र तथा वर और अभय दान की मुद्रा बनी हुई है वह 'राजसी' कहलाती है।
शस्त्रास्त्रैर्दैत्यहन्त्री या ह्युग्ररूपधरा सदा ।
युद्धाभिनन्दिनी सा तु तामसी प्रतिमोच्यते ॥ ८३ ॥
**तामसी प्रतिमा के लक्षण—**जो प्रतिमा शस्त्र तथा अस्त्रों से दैत्यों को मारनेवाली, उग्ररूप को धारण किये हुई, सदा युद्ध के लिये उत्सुक रूप में होती है वह 'तामसी' कहलाती है।
संक्षेपतस्तु ध्यानादि विष्ण्वादीनां तथोच्यते ।
प्रमाणं प्रतिमानां च तदङ्गानां सुबिस्तरम् ॥ ८४ ॥
संक्षेप से विष्णु आदि देवताओं का जैसा ध्यान है तथा विस्तारपूर्वक प्रतिमाओं का एवं उनके अङ्गों का प्रमाण है, वैसा कहते हैं।