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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५

ब्रह्मणस्तु चतुर्दिक्षु मुखानां विनियोजनम् ॥ १४२ ॥ **ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था—**ब्रह्मा की मूर्त्ति में चारों दिशाओं में एक २ मुख बनाना चाहिये ।

हयग्रीवो वराहश्च नृसिंहश्च गणेश्वरः ।
मुखैर्विना नराकारो नृसिंहश्च नखैर्विना ॥ १४३ ॥

**हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार—**हयग्रीव, वराह, नृसिंह, गणेश्वर ( गणेश ), इन ४ देवताओं की मूर्त्तियों में मुख को छोड़ कर शेष अङ्ग मनुष्य के आकार का बनाना चाहिये अतः हयग्रीव का मुख घोड़े की भाँति, वराह का सूअर की भाँति, नृसिंह का सिंह की भाँति और गणेश का मुख हाथी की भाँति बनाना चाहिये । और नृसिंह का नख भी सिंह की भाँति ही होना चाहिये ।

तिष्ठन्तीं सूपविष्टां वा स्वासने वाहनस्थिताम् ।
प्रतिमामिष्टदेवस्य कारयेदुक्तलक्षणाम् ॥ १४४ ॥
हीनश्मश्रुनिमेषां च सदा षोडशवार्षिकीम् ।
दिव्याभरणावस्त्राढ्यां दिव्यवर्णक्रियां सदा ॥ १४५ ॥
वस्त्रैरापादगूढां च दिव्यालङ्कारभूषिताम् ।
अपने आसन पर खड़ी अथवा सुखपूर्वक बैठी हुई अथवा वाहन पर स्थित, दाढ़ी तथा मूंछ से एवं निमेष से रहित, सदा १६ वर्ष की अवस्था वाली, दिव्य आभरण तथा वस्त्र से युक्त, दिव्य वर्ण तथा क्रियावाली, वस्त्रों से पैर तक ढकी हुई, दिव्य अलङ्कारों से भूषित ऐसी पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त अपने इष्टदेव की प्रतिमा बनवानी चाहिये ।

हीनाङ्गो नाधिकाङ्गश्च कर्त्तव्या देवताः क्वचित् ॥ १४६ ॥
हीनाङ्गी स्वामिनं हन्ति ह्यधिकाङ्गी च शिल्पिनम् ।
कृशा दुर्भिक्षदा नित्यं स्थूला रोगप्रदा सदा ॥ १४७ ॥
**अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण—**हीन तथा अधिक अङ्गोंवाली देवता की प्रतिमा कभी नहीं बनवानी चाहिये । क्योंकि हीन अङ्गवाली प्रतिमा मूर्त्ति बनवानेवाले स्वामी को एवं प्रमाण से अधिक अङ्गोंवाली शिल्पी ( मूर्त्तिकार ) को नष्ट कर देती है । कृश अङ्गवाली नित्य दुर्भिक्ष ( अभाव ) देनेवाली और स्थूल अङ्गवाली प्रतिमा सदा रोग देनेवाली होती है ।

गूढसन्ध्यस्थिधमनी सर्वदा सौख्यवर्धिनी ।
**सौख्यदायक प्रतिमा के लक्षण—**जिसकी सन्धि, अस्थि तथा धमनियां नहीं दिखाई पड़ती हैं ऐसी प्रतिमा सर्वदा सुख बढ़ानेवाली होती है ।