शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| २७० | शुक्रनीतिः |
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बुद्धिमान राजा अथवा न्याय-सभा के सदस्यगण अकेले एकान्त में वादी-प्रतिवादी के कार्यों (मुकदमों) को कभी न देखे और न उनकी बातों को सुने ।
पक्षपाताधिरोपस्य कारणानि च पञ्च वै ॥ ७ ॥
रागलोभभयद्वेषा वादिनोश्च रहःश्रुतिः ।
पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश— पक्षपात रूप दोष के निश्चित रूप से ये ५ कारण हैं—१. राग, २. लोभ, ३. भय, ४. द्वेष, ५. वादी-प्रतिवादी की एकान्त में बातें सुनना ।
पौरकार्याणि यो राजा न करोति सुखे स्थितः ॥ ८ ॥
व्यक्तं स नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः ।
राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश— जो राजा सुखभोग में आसक्त रहकर पुरवासी-प्रजाजनों का हित-कार्य मुकदमा आदि देखना, नहीं करता है । वह भविष्य में निश्चित घोर नरक का दुःख भोगेगा । इसमें सन्देह नहीं है ।
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात् कुर्यान्नराधिपः ॥ ९ ॥
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ।
जो राजा मूढतावश अधर्म कार्यों को करता है उस दुरात्मा को शत्रु लोग शीघ्र अपने वश (अधीन) कर लेते हैं ।
अस्वर्ग्या लोकनाशाय परानीकभयावहा ॥ १० ॥
आयुर्बौजहरी राज्ञामस्ति वाक्ये स्वयंकृतिः ।
वादी-प्रतिवादी जनों की बातों को सुनकर राजा यदि सभासदों की राय लिये बिना स्वयं कोई निर्णय करता है तो उससे उसे नरक की प्राप्ति, प्रजाओं का नाश, शत्रुसेनाओं से भय (शत्रुओं की वृद्धि) आयु का क्षय इत्यादि होते हैं ।
तस्माच्छास्त्रानुसारेण राजा कार्याणि साधयेत् ॥ ११ ॥
इससे राजा को शास्त्रानुसार कार्यों (मुकद्दमों) को भलीभांति देखना चाहिये ।
यदा न कुर्यान्नृपतिः स्वयं कार्यविनिर्णयम् ।
तदा तत्र नियुञ्जीत ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ १२ ॥
दान्तं कुलीनं मध्यस्थमनुद्वेगकरं स्थिरम् ।
परत्र भीरुं धर्मिष्ठमुयुक्तं क्रोधवर्जितम् ॥ १३ ॥
स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश— जब राजा स्वयं कार्यों (मुकद्दमों) का निर्णय न करे तब