शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| २८८ | शुक्रनीतिः |
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कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश— जो स्त्रियां स्वयं कमाकर कुटुम्ब की जीविका चला रही हैं या व्यभिचारिणी किंवा वेश्यावृत्ति करनेवाली हैं, या हीन कुलवाली या पतिता (जातिच्युता) हों उन्हें राजा कचहरी में बुला सकता है।
प्रवर्त्तयित्वा वादं तु वादिनौ तु मृतौ यदि ॥ ११८ ॥
तत्पुत्रो विवदेत्तज्ज्ञो ह्यन्यथा तु निवर्त्तयेत् ।
विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश— मुकदमा कायम करके यदि वादी-प्रतिवादी मर जायं तो उनके पुत्र मुकदमा लड़ सकते हैं। यदि वे लड़ने के लिये न आयें तो राजा मुकदमा समाप्त (खारिज) कर दे।
मनुष्यमारणे स्तेये परदाराभिमर्शने ॥ ११९ ॥
अभक्ष्यभक्षणे चैव कन्याहरणदूषणे ।
पारुष्ये कूटकरणे नृपद्रोहे च साहसे ॥ १२० ॥
प्रतिनिधिर्न दातव्यः कर्त्ता तु विवदेत् स्वयम् ।
मनुष्य की इत्यादि अपराधों में प्रतिनिधि करने का निर्देश— मनुष्य की हत्या करने पर, या चोरी, किसी पराई स्त्री के साथ व्यभिचार, अभक्ष्य (न खाने योग्य शास्त्र निषिद्ध पदार्थ) भक्षण किंवा किसी की कन्या हरण, या किसी को कठोर वचन का प्रयोग, जालसाजी, राजद्रोह, साहस (डाका पड़ना) इत्यादि करने पर प्रतिनिधि नहीं देना चाहिये प्रत्युत स्वयं कर्त्ता उपस्थित होकर मुकदमा लड़े।
आहूतो यत्र नागच्छेद् दर्पाद् बन्धुबलान्वितः ॥ १२१ ॥
अभियोगानुरूपेण तस्य दण्डं प्रकल्पयेत् ।
अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश— और यदि उक्त मुकदमों में अभियुक्त (अपराधी) अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आवे तो राजा उसे जबरदस्ती बुलाकर अपराधानुरूप दण्ड देवे।
दूतेनाह्वानितं प्राप्ताधर्षकं प्रतिवादिनम् ॥ १२२ ॥
दृष्ट्वा राज्ञा तयोश्चिन्त्यो यथार्हप्रतिभूस्त्वतः ।
दास्याम्यदत्तमेतेन दर्शयामि तवान्तिके ॥ १२३ ॥
एनमार्थं दापयिष्ये ह्यस्मात्तेन भयं क्वचित् ।
अकृतं च करिष्यामि ह्यनेनायं च वृत्तिमान् ॥ १२४ ॥
प्रतिभू (जमानतदार) के कृत्यों का निर्देश— दूत (चपरासी) के द्वारा बुलाने से आये हुये अपराधी या प्रतिवादी को देखकर राजा उन दोनों के