शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६६
होता है। और कोई धर्मज्ञ साक्षी अकेले वादी-प्रतिवादी दोनों के लिये मान्य होता है।
यथाजाति यथावर्णं सर्वे सर्वेषु साक्षिणः ॥ १८६ ॥ गृहिणो न पराधीनाः सूरयश्चाप्रवासिनः । युवानः साक्षिणः कार्याः स्त्रियः स्त्रीषु च कीर्त्तिताः ॥ १८७ ॥
जाति और वर्ण के अनुसार सभी वर्णों में सभी वर्ण के लोग साक्षी हो सकते हैं। और गृहस्थ, किसी के अधीन न रहनेवाले, विद्वान, परदेश में नहीं रहनेवाले, युवावस्थावाले जो हों वे साक्षी बनाने योग्य होते हैं। और स्त्रियों के विवाद में स्त्रियों की साक्षी लेनी चाहिये।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च । वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ १८८ ॥
**साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय—**सभी डांका, चोरी और बलात्कार या अपहरण, कठोर भाषण और कठोर दण्ड इन सबों में साक्षी की विशेष परीक्षा नहीं की जाती है। इनमें चाहे जो भी साक्षी दे सकता है।
बालोऽज्ञानादसत्यात् स्त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत् । विब्रूयाद् बान्धवः स्नेहाद् बैरनिर्या॑तनादरिः ॥ १८६ ॥ अभिमानाच्च लोभाच्च विजातिश्च शठस्तथा । उपजीवनसङ्कोचाद् भृत्यश्चैते ह्यसाक्षिणः ॥ १९० ॥ नार्थसम्बन्धिनो विद्यायौनसम्बन्धिनोऽपि न ।
**बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश—**बालक अज्ञान से, स्त्री झूठ बोलने का अभ्यास होने से, जालसाज निरन्तर जालसाजी करने से, बान्धव स्नेह से, शत्रु शत्रुता साधने से, हीन जातिवाला अपनी संमान-वृद्धि की आशा से, शठ लोभ से, नौकर जीविका चले जाने के भय से विरुद्ध बोल सकते हैं अतः ये सब साक्षी मानने के योग्य नहीं होते हैं। और किसी प्रकार का अर्थ (धन) सम्बन्ध रखनेवाले, साथ पड़नेवाले और जमाई आदि सम्बन्धी ये सब भी साक्षी बनाने योग्य नहीं होते हैं।
श्रेण्यादिषु च वर्गेषु कश्चिच्चेद् द्वेष्यतामियात् ॥ १९१ ॥ तस्य तेभ्यो न साक्ष्यं स्याद् द्वेष्टारः सर्व एव ते ।
श्रेणी (एक जाति के कारीगरों के समूह) आदि वर्गों में से यदि किसी एक व्यक्ति के प्रति उक्त वर्ग द्वेषी हो जाय तो उस वर्ग के किसी भी व्यक्ति की साक्षी नहीं माननी चाहिये, क्योंकि एकता होने से उस वर्ग के सभी द्वेष करनेवाले हो जाते हैं।
न कालहरणं कार्यं राज्ञा साक्षिप्रभाषणे ॥ १९२ ॥