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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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<u>“कथा साहित्य की उत्पत्ति और विकास”</u>

किसी सजीव सप्राण प्रेरणादायक भावाभिव्यक्ति के लिए तदनुरूप तद्भार वहन समर्थ विधान में ही कला की सार्थकता है। मानव इतिहास की जाज्वल्यमान किरणें अतीत के अन्धकार को जहाँ एक ओर प्रकशित करती हैं अथवा उसकी एकाध चिनगारी के सहारे कल्पना जहाँ तक आगे जा सकती है वहाँ से लेकर आज तक कलाकार का यही उद्देश्य रहा है। ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखलाई पडता जिससे यह कहा जा सके कि कला अपने इस चिरपरिचित ध्येय के प्रति आदर शैथिल्य भाव प्रगट कर रही है। अति–अति प्राचीन काल से मानव अपने भावाभिव्यक्ति के लिए अनेक माध्यमों का सहारा लेता आया है। इन माध्यमों में एक सशक्त माध्यम था– “कथा”। 'कथा' शैली के माध्यम से कवियों ने धर्म, दर्शन, नीति, आचार, व्यवहार, इतिहास, भूगोल आदि विवध विषयों का विवेचन प्रचुर मात्रा मे इस प्रकार के रोचक एवं उपदेशात्मक विधि से किया कि वह सस्कृत साहित्य में एक सहज और सशक्त शैली बन गयी।

यदि ये कहा जाय कि कथा की उत्पत्ति का इतिहास उतना ही प्राचीन है। जितना की सृष्टि की उत्पत्ति अथवा मानव उत्पत्ति के विकास का इतिहास तो यह गलत न होगा।

“श्री देवराज उपाध्याय” भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुये कहते हैं कि कथा–साहित्य की उत्पत्ति मनुष्य के कौतुहल वृत्ति को संतुष्ट करने के लिये हुई होगी, पर यह कौतुक वृत्ति थोडा आगे बढ़ते ही मानव के भाग्य को, उसके आचरण को, उसके सुख–दुःख के स्वरूप को पहचानने की प्रवृत्ति मे परिणत हो गयी होगी। उसी समय साहित्य का जन्म हुआ होगा। हो सकता है कथा आरम्भ में कथा मात्र रही हो, पर वह कथा साहित्य का युग नहीं रहा होगा, वह युग रहा होगा कथा मात्र का। केवल कथा सुन–सुनाकर कौतुक शान्त कर देने वाला, परन्तु जिस दिन