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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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अधिक देर तक इधर-उधर घूमता रहा तब उसने मनमानी रति किया और पति से इस प्रकार कहा-

हे मूर्ख! तुम्हारे सामने मैंने मनमानी रति की तुम शूर किन्तु मेरे अहित हो अत. मै तुम्हारे यहाँ से जा रही हूँ और उपपति द्वारा लाये गये घोडे पर चढकर चली गयी। उसको जाते देख राहड भी लज्जित हो मुख छिपाकर रह गया। अतएव स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता। क्योकि-

(स्त्री के वश में होकर) प्राचीन काल मे शङ्कर को नाचना पड़ा। श्रीकृष्ण ने रास किया और ब्रह्म पशुता को प्राप्त हुये, स्त्रियो से किसकी विडम्बना नहीं हुई?¹

शुक का यह वचन सुनकर प्रभावती ने कहा स्त्री, जन्म का, वृद्धि का तथा सुख का कारण है, उसकी तुम कैसे निन्दा करते हो?²

शुक ने कहा-तुम्हारी यह बातें पतिव्रता के विषय से सम्बन्धित हैं, अन्य स्त्रियों के विषय में यह बात नहीं लागू होती।

कथा- 60

"राजदूत हरिदत्त की कथा"

वीर नामक राजा की सभा के विषय में कच्छ देश के राजा ने सुना कि वह आश्चर्यमय, देवनिर्मित तथा सकल रत्नों से विभूषित है। उसने अपने दूत हरिदत्त को सुन्दर रत्न तथा घोड़े एवं हजार उपायन देकर भेजा। वह दूत उसकी पुरी में जाकर राजा से बोला-मेरे स्वामी ने आपकी विचित्र सभा को देखने के लिए मुझे भेजा है।


1 आननर्त पुरा शम्भुर्गोविन्दो रासकृत्तथा।
ब्रह्मा पशुत्वमापन्नः स्त्रीभिः को न विडम्बितः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 284, पेज सं० 241-42

2 उत्पत्तिकारणं तन्वी तन्वी वृद्धेश्च कारणम्।
सुखस्य कारणं तन्वी सा कथ कीर दुष्यते।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 287, पेज सं० 242

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