शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
Page 114 of 208
Read in contextकामुक बैल घबड़ाकर भाग गया। वह लौटकर पत्नी से अपने पौरूष का वर्णन करने लगा।
कथा- 65
"श्रावक श्रीवत्स की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि– जनस्थान नामक नगर में नन्दन नामक राजा नाम के अनुसार गुणवाला था। उसी नगर में परम शिव भक्त श्रीवत्स नामक साधु था। एक बार वह शिष्यों समेत वाराणसी नगर को जा रहा था। रास्ते में एक शिष्य को मांस लाने के लिए भेजा। अन्य साधुओं ने उसे ऐसा करते देख लिया। जब सभी साधु बैठ गये तब वह साधु हँसने लगा और सभी साधुओं से पूछने पर कहा– यह ऐसा विचित्र शिष्य है। मैंने कहा–"मां संवर्तते" इति, इसने नासमझी से इस वाक्य के 'मां' के साथ संवर्तते के सम् को मिलाकर वाक्य का विच्छेद यों कर दिया–'मांसं वर्तते'। तदुनसार व्यवहार में प्रवृत्त हुआ।
कथा- 66
"हंसराट् शङ्खधवल की कथा"
भूतल पर निर्जन, पक्षियों को रुचिकर एवं प्रिय, दशयोजन विस्तृत एक रम्य वन है। उसमें दो कोस विस्तृत शीतल छाया वाले, जलाशय के तीर पर स्थित बरगद के वृक्ष पर हंसधवल नामक हंसराज कुटुम्ब समेत दिन भर विचरण करके शाम को विश्राम करता था। एक दिन वे हंस शिकारी की जाल में फँस गये। अपने कुटुम्ब को उस प्रतार जाल में बंधा जानकर शंखधवल ने कहा–पुत्रों! जब वह व्याध प्रातः तुम लोगों को देखे तो तुम सब मुर्दे के समान श्वांस छोड़कर लेट जाना और वह तुम्हें मरा हुआ समझकर भूमि पर फेंक देगा तो तुम सब उड़ जाना। बहेलिया प्रातः आया और उसने उनको मरा हुआ समझकर फेंक दिया और वे सब उड़कर अभीष्ट देश को चले गये।
[ 105 ]