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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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प्रचार-प्रसार के लिये इस साहित्यिक विधा का क्रमशः उपवृद्धघण होता चला आया है और यह विधा सम्पूर्ण भूमण्डल पर इसी रूप में प्रायः सभी भाषाओं में अन्तर्निहित है। कथा-साहित्य रूप विधा अत्यन्त सहजता से मूढ हृदय को भी अपनी ओजस्विता से शीघ्र ही प्रभावित करती है। यह माध्यम वस्तुतः अनादिकाल से अक्षुण्ण है एवं अनन्तकाल तक इसकी अजस्र धारा बहती रहेगी। साहित्य के इतिहास में इस कला के संवर्द्धन में बौद्ध और जैनियों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। उपदेश या नीति शिक्षा को चरितार्थ करने के बहाने जैनियों ने भी उपर्युक्त माध्यम का खूब सहारा लिया।

"पञ्चतन्त्र", "हितोपदेश" आदि संस्कृत साहित्य के अत्यन्त प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रन्थो का दुनियाँ में सभी साक्षर व्यक्ति सम्मान करते हैं, जिसमें नीति, उपदेश, शिक्षा, विज्ञान आदि सम्पूर्ण तत्वों को प्रगट करने का मनोहर माध्यम कथायें ही हैं। सामान्य लौकिक कहानियाँ मात्र मनोरञ्जन की ही सामग्री नहीं है अपितु पशु-पक्षियों की कथाओ के रूप में विशेषतः शिक्षा के लिये ही प्रयुक्त होती रही हैं।

वस्तुतः यह विधा संस्कृत साहित्य की प्राणात्मिका शक्ति है। ऐसा कहने में हमें तनिक भी हिचक नहीं होना चाहिए। संस्कृत साहित्य की संदेश संवाहिका एवं उन संदेशो के बहुआयामी शिक्षण के विषयों से ओत-प्रोत कथा विधा के विषय में "एच०एल० हरिअप्पा" ने विचार व्यक्त करते हुये कहा है¹ कि सशक्त तथा वीर योद्धा होने के लिये विपत्ति में पड़े हुए को बचाने के लिए उदार तथा सहायक बनने, दान लेने और देने, सच्चे बनने तथा ईष्या से मुक्त होने या संक्षेपतः ईश्वर का आदर करने और मानव को प्रेम करने के प्रति उत्साह प्रदान करने के अतिरिक्त प्राचीन कथाओं से हम और क्या उपदेश चाहते हैं।"


¹ एच० एल० हरिअप्पा, "ऋग्वैदिक लीजेण्ड थ्रू दी, एजेज" पृ०- 145

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