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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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(ख) प्रभावती :

यदि यह कहा जाय कि शुकसप्तति ग्रन्थ की कथाओ के जन्म का मूलाधार प्रभावती है तो यह कथन त्रुटिपूर्ण न होगा। शुकसप्तति की समस्त कथायें प्रभावती को शीलभङ्गरुप महापराध से बचाने के निमित्त अस्तित्व में आती हैं जिसे कवि ने दृढ़तापूर्वक और स्पष्ट रुप में ग्रन्थ के मंङ्गलाचरण मे स्वीकार किया है। “वच्मि चेतो”।

प्रभावती पतिव्रता, सुचरित्रा एव मुग्धा श्रेणी की नायिका है। पति के देशान्तर चले जाने के बाद प्रभावती शोकयुक्त हो जाती है, वियोगावस्था के दिन कुछ समय तो काट लेती है किन्तु कुछ काल पश्चात् सखियों के बहकावें में आकर परपुरूष की सङ्गति में अभिलाषवत् होती है। स्पष्ट है कि प्रभावती पतिव्रता तो है किन्तु अस्थिर बुद्धि की होने के कारण सङ्कट के समय अधीर हो उठती है। धीरा नायिका की कोटि में होती हुई भी वह अधीर हो उठती है अतः प्रभावती “धीराधीरा” नायिका की श्रेणी में आती है।

प्रभावती एक कुशल गृहिणी, धैर्यशील एवं संयमी नारी है। यद्यपि सखियों के द्वारा समझाये जाने पर कुमार्ग पर जाने के लिए उद्यत तो होती है किन्तु शुक के द्वारा उपदेश दिये जाने पर उसका सयमी स्वरुप जाग उठता है और वह शुक की कथा को सुनने का प्रस्ताव मान लेती है। इससे स्पष्ट है कि वह बुद्धिमती एवं साहसी नारी है। साथ ही साथ सदुपदेश के महत्व को गहराई से समझने की शक्ति भी उसमे विद्यमान है। तभी तो वह प्रतिदिन शुक की कथा को धैर्यपूर्वक श्रवण करती है। यद्यपि प्रत्येक कथा के अन्त में शुक उसके सामने प्रश्न रखता है कि ऐसी स्थितियों मे यदि तुम रमण के लिए जाना चाहती हो तो जाओ।

प्रभावती धैर्यशीला होने पर भी विचारशीला नारी है। यही कारण है कि शुक द्वारा “यदि तुम रमण के लिए जाना चाहती हो तो जा सकती हो” का अनिरोधात्मक प्रस्ताव रखे जाने पर भी वह गम्भीरतापूर्वक विचार करती है। इस प्रकार प्रभावती

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