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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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लोक-कथाओं में इतनी बहुरूपता है कि इनका अति सूक्ष्म विभाजन करना सम्भव नही है, किन्तु स्थूल रूप से इनका वर्गीकरण दो दृष्टिकोणों से किया जा सकता है- (1) प्रयोजन की दृष्टि से, (2) पात्रों की दृष्टि से।

प्रयोजन की दृष्टि से लोक-कथाओं को नीतिकथा, मनोरञ्जन प्रधान कथा और इतिवृत्तात्मक अथवा दन्तकथा तीन वर्गों में रखा जा सकता है।

पात्रों की दृष्टि से कथाओं को तीन वर्गों में रखा जा सकता है।¹ जन्तु कथा, मानवीय कथा, अतिमानवीय कथा।

यद्यपि मनोरञ्जन का तत्व सभी कथाओ में अवश्य ही विद्यमान रहता है, किन्तु जिस कथा का उद्देश्य रोचक ढंग से नीति का उपदेश देना हो, वह नीति कथा तथा जो प्रमुखतः किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के विषय में कोई किंवदन्ती अथवा इतिवृत्त प्रस्तुत करती हो, वह इतिवृत्तात्मक अथवा दन्त कथा कही जायेगी, तथा जिन कथाओं का प्रयोजन मात्र मनोरञ्जन करना हो, वह मनोरञ्जन प्रधान कथायें कहीं जायेंगी।

जन्तु कथा के पात्र प्रमुख रूप से पशु-पक्षी ही होते हैं और प्रयोजन भी इनका बोधात्मक ही होता है। अतएव इनका अन्तर्भाव नीतिकथाओं में ही हो जाता है। मानव के समान गुणों और आचरणो का आवरण यदि पशु-पक्षियों को भी पहनाकर प्रस्तुत किया जाये तो उनसे जो विनोदपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है, उसके प्रभाव से जन्तु-कथा पाठक या श्रोता के मन में सहज ही घर कर जाती है और इसके माध्यम से दिया गया उपदेश भुलाने पर भी नहीं भूलता। साथ-ही-साथ जन्तु-कथाओं में पशु-पक्षियों के स्वभाव आदि का भी सूक्ष्म निरीक्षण देखते ही बनता है।


1 ए०बी० कीथ , 'हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर' पृष्ठ- 243

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