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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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दीपक का लक्षण :

सकृद्वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्।
सैव क्रियासु वह्वीषु कारकस्येति दीपकम्।¹

जहाँ अप्रस्तुत (अप्रकृत अथवा उपमान) तथा प्रस्तुत (प्रकृत अथवा उपमेय) पदार्थों मे एक ही धर्म का सम्बन्ध हो अथवा (जहाँ) अनेक क्रियाओं का एक ही कारक हो, वही दीपक अलङ्कार होता है। जैसे–

हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन्नपि दुर्जनः।
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः।²

हँसता हुआ भी राजा, सम्मान करता हुआ भी दुष्ट, स्पर्श करता हुआ भी गज, सूँघता हुआ भी सर्प, प्राणों को हरता है।


मालदीपक का लक्षण :

मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।³

यदि पूर्व–पूर्व (वस्तु) उत्तर–उत्तर की उपकारक (गुणाधायक) हो तो मालादीपक अलङ्कार होता है। जैसे–

उत्तमाः स्वगुणैः ख्याता माध्यमाश्च पितुर्गुणैः।
अधमा मातुलैः ख्याता श्वशुरैश्चाधमाधमाः।⁴

उत्तम व्यक्ति अपने गुणो से, मध्यम व्यक्ति पिता के गुणों से, अधम व्यक्ति मामा के गुणो से तथा अधमों में अधम–महा अधम व्यक्ति ससुर के गुणों से प्रसिद्धि प्राप्त करते है।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र सं० 155, पृष्ठ स० 487
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 36, पृष्ठ स० 33-34
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 156, पृष्ठ स० 489
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 66, पृष्ठ स० 52

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