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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते।
यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति।¹

पुरूष तभी तक सन्मार्ग पर ठहरा रहता है, तभी तक इन्द्रियों के निरोध में समर्थ होता है, तभी तक लज्जा करता है, तभी तक विनय अपनाये रहता है, जब तक (कर्णपर्यन्त) खिंचे भ्रूरूप चाप से छोडे गये, लोचनपर्यन्त विस्तृत, नील बरौनीरूप पक्षवाले, धैर्य को विनष्ट करने वाले, सुन्दरियों के ये नेत्ररूप बाण हृदय में नहीं चुभते है।

अत्रान्तरे विशालाक्षि चन्द्रो हन्तुं तमोरिपुम्।
उदयाद्रिशिरः स्थातुमुद्यतोंऽशुभटैर्वृतः।।²

हे आयत लोचने! इस बीच में अन्धकार रूप शत्रु का विनाश करने के लिए चन्द्रमा किरण रूप योद्धाओं समेत उदयाचल के शिखर पर स्थित होने के लिये उद्यत हुआ।

प्रतिवस्तूपमा का लक्षण :

प्रतिवस्तूपमा तु सा।
सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थितिः।³

जहा एक ही साधारणधर्म को दो वाक्यों में दो बार (भिन्न शब्दों से) कहा जाय वह प्रतिवस्तूमा (अलंङ्कार) होती है। जैसे-

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्राम जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवी त्यजेत्।।⁴

कुल की रक्षाके लिये एक को त्याग देना चाहिये। गाँव की रक्षा के लिये कुल को त्याग देना चाहिए। जनपद (देश) की रक्षा के लिये गाँव को तथा अपनी रक्षा के लिये पृथिवी (देश) को त्याग देना चाहिये।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 118, पृष्ठ स० 99-100
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 145, पृष्ठ स० 119
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 153, पृष्ठ स० 484
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 37, पृष्ठ स० 34

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