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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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चार पाद होते हैं जबकि वैदिक छन्दो में त्रिपाद वाले और पंचपाद वाले भी छन्द हैं। वैदिक छन्दो में अक्षरो की संख्या सन्धि तोडकर पूरी कर ली जाती है, जहाँ कहीं भी अक्षर नियमित संख्या से कम पाये जाते हैं जैसे-‘वरेण्यम’ में वरेणि+यम’ मान लिया जाता है किन्तु लौकिक छन्दों में वर्ण के लिये ऐसा नहीं माना जा सकता। वैदिक छन्दो के अन्तर्गत अनुष्टुप और त्रिष्टुप छन्द आते हैं। शेष लौकिक छन्दों के अंतर्गत हैं। जैसे- बसन्ततिलका, मालिनी, इन्द्रवज्रा आदि।

संस्कृत छन्दों की रचना मात्राओं से की जाती है स्वरों से नहीं। प्रत्येक लौकिक-छन्द में चार पाद होते हैं और प्रत्येक पाद में यदि वह समवृत है तो नियमित वर्ण ही होगे और वर्णों में भी लघु गुरू नियमानुसार ही होते हैं। लघु का चिन्ह (I) और गुरू का चिन्ह (s) है।

मात्रिक छन्दों में मात्राओं की गणना की जाती है वर्णों की नहीं जबकि वर्णवृत्तों में लघु गुरू वर्णों की गणना की जाती है।

छन्द योजना काव्य-शिल्प का महत्वपूर्ण अंङ्ग हैं काव्य की आत्मा रस का महत्वपूर्ण सम्बन्ध मानव अन्तस की भाव तरंङ्ग से है। मनोवेग काव्य में प्रयुक्त शब्दों की स्वर लहरी से उद्धवेलित होते हैं। यह स्वर लहरी मधुर, ललित एवं पुरूषलय की व्यञ्जक होती है और यही लय ही छन्द की आत्मा है। इस प्रकार छन्द-योजना का रस व्यञ्जना से घनिष्ठ सम्बन्ध है। संस्कृत काव्यशास्त्रों में छन्दों की प्रकृति पर गहराई से विचार किया गया है। आचार्य क्षेमेन्द्र ने छन्दों के विषय में विशेष रूप से विचार किया और इस शाश्वत सत्य का उद्घाटन किया कि अमुक छन्द अमुक भाव अथवा रस या वस्तु वर्णन के लिये विशेष उपयुक्त है।

शुकसप्तति यद्यपि कथा-प्रधान (गद्य) ग्रन्थ है तथापि कवि ने इसमें छन्दों का यत्र-तत्र प्रयोग किया है। इस ग्रन्थ में प्रयुक्त छन्द वर्णनीय वस्तु के अनुसार प्रयुक्त हुये हैं। इनमें से कुछ वैदिक हैं कुछ लौकिक हैं, जिनका विवेचन इस प्रकार है-

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