शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextविवाहे पार्वतीं दृष्ट्वा हरस्य हरवल्लभाम्।
चस्कन्द रेतस्तस्यापि, बालखिल्यास्तदुद्भवाः।।¹
इस अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह बतलाया गया है राजा के समीप न जाने से मनुष्य किस दशा को प्राप्त हो जाता है और बालखिब्य ऋषि की उत्पत्ति कैसे हुई।
शार्दूलविक्रीडित (प्रत्येक चरण में उन्नीस अक्षर) :
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।²
जिस छन्द के प्रत्येक चरण मे क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण तथा अन्त मे एक गुरू वर्ण आये एवं 12 तथा 7 सख्यक अक्षरों पर यति हो, उसे शार्दूलविक्रीडित छन्द कहा जाता है।
वैद्य पानरतं नटं कुपठितं मूर्खं परिव्राजकं
योधं कापुरुषं विटं विवयसं स्वाध्यायहीनं द्विजम्।
राज्यं बालनरेन्द्रमन्त्रिरहित मित्रं छलान्वेषि च
भार्या यौवनगर्वितां पररता मुञ्चन्ति ये पण्डिताः ।।³
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि पण्डितजनों को मद्यपीने वाले वैद्य, ठीक सवाद न कहने वाले अभिनेता, मूर्ख संन्यासी, कायर योद्धा, बुड्ढे विट, वेदादि नहीं पढ़ने वाले ब्राह्मण, मन्त्रिरहित बालराजा के राज्य, कपटाचारी मित्र तथा यौवनोन्मत्त एवं परपुरूष मे आसक्त पत्नी का परित्याग कर देना चाहिये।
क्षुत्क्षामस्य करण्डपिण्डिततनोम्म्लानिन्द्रियस्य क्षुधा
कृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुखे भोगिनः।
तृप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव यातः पथा
स्वस्थास्तिष्ठत दैवमेव हि नृणां वृद्धौ क्षये कारणम्।⁴
¹ शु० स०, श्लोक स० 97 पृष्ठ स० 76
² वृत्तरत्नाकर, 3/100
³ शुकसप्तति, श्लोक स० 27, पृष्ठ सं० 28
⁴ शुकसप्तति, श्लोक स० 62, पृष्ठ स० 47-48
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