शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextआर्याछन्द :
यस्या. पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि ।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चमदश साऽऽर्या ।।¹
अर्थात जिसके प्रथम चरण मे तथा तृतीय चरण मे भी बारह मात्रायें हों, द्वितीय चरण में अठारह तथा चतुर्थ चरण मे पन्द्रह मात्रायें हो, वह आर्या है।
जैसे-
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात् ।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ।²
प्रस्तुत आर्या छन्द के माध्यम से यही उपदिष्ट किया गया है कि अनुकूल दैव दूसरे दीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात् शीघ्र लोकर मिला देता है।
उपर्युक्त छन्दो के प्रयोग को देखकर यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी किसी विशिष्ट बात पर बल देने के लिये छन्दों का आश्रय लिया है। आदर्श सम्बन्धी, व्यवहार परक, नीतिपरक कथनों मे वैशिष्ट्य उत्पन्न करने के लिये ही कवि ने विविध छन्दो का प्रयोग किया है जो गद्य द्वारा संभव नहीं था। शुकसप्तति की गद्यमयी कथा के मध्य में इन छन्दो का प्रयोग ‘सोने मे सुहागे’ का काम करते हैं। ये छन्द कथा को गति प्रदान करने में ही सार्थक भूमिका निभाते हुये दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार कवि का छन्द प्रयोग अत्यन्त सार्थक है।
¹ श्रुतबोध।
² शुकसप्तति-, श्लोक स० 61 पृष्ठ स० 39
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