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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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एव अनेको सूक्त वाङ्गमय मे प्रबन्ध काव्य एवं नाटकों से सम्बद्ध हैं। ऐसे आख्यान गद्य एवं पद्यात्मक हैं। इनके स्वरूप पर पाश्चात्य विद्वानो में अनेक मदभेद है। पद्यभाग में रोचकता होने से स्थिरता अधिक पायी जाती रही है, एवं गद्यभाग में मात्र कथात्मकता होने के कारण अस्थिरता। ऋग्वेदीय संवाद सूक्तो को गद्यात्मक एवं पद्यात्मक होने के कारण (चम्पू शैली) को पाश्चात्य विद्वान "ओल्डेन वर्ग" ने आख्यान नाम दिया है। संगीत का सहारा लेकर (गीत, नृत्य, वाद्य) प्रबंध एवं नाटक कालान्तर में प्रार्दुभूत हुए। इस प्रकार वैदिक साहित्य मे संवाद सूक्तों में कथा का स्वरूप सर्वत्र अर्न्तनिहित है। जो समय-समय पर युग-युगान्तर में परिस्थिति विशेष के परिवर्तन एवं नवीन कल्पनाओ के आधार पर बदलती हुई परिवृद्धित होकर के साहित्य में आकर्षण के केन्द्र है।

ऋग्वेद के अनेकों आख्यान उपवृंहण के आधार पर ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद ग्रन्थ, सूत्रग्रन्थ एवं रामायण, महाभारत तथा पुराणों मे परिवर्तित होकर विश्व-साहित्य में अपना एक अक्षुण्ण स्थान बनाए हुए हैं। वेदों में सम्प्राप्त प्रमुख आख्यान जैसे-शुनःशेप 1/24, अगस्त्य और लोपा मुद्रा 1/179, गृत्समद 2/92, वशिष्ठ और विश्वामित्र 3/53 तथा 7/33, सोम का अवतरण 3/43, त्रयरूप और वृश जान 5/2, अग्नि का जन्म 5/11, श्यावश्व 5/32, वृहस्पति का जन्म 6/71, राजा सुदास 7/18, नहुष 7/95, उर्वशी और पुरूरवा 10/95, सरमापाणि 10/108, देवापि और शान्तनु 10/98, नचिकेता 10/135, च्यवन और सुकन्या 1/116, 117, सोभरि-काण्व 8/19, दध्यंग-आथर्णव 1/116, 12 तथा यम-यमी 10/10 आदि।

उपर्युक्त कथाओं के संरचना की कला अत्यन्त सरल तो अवश्य है किन्तु पूर्ण विकसित नहीं है, ऐसा कहा जा सकता है। इसके साथ-साथ हमें यह भी कहने मे हिचक नही है कि उनमें अतिमानवीय एवं चमत्कारी पात्रों का अभाव सा मालूम पड़ता

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