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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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राजनैतिक, तथा लौकिक जगत से सम्बन्धित अपने कथन को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने के लिये सूक्तियों का आश्रय लेते आये हैं। यदि कथन को सामान्य रूप से कहा जाय तो समाज में उसका प्रभाव प्रायः नही पड पाता, किन्तु उसी कथन को यदि अलङ्कारिक या चमत्कारिक ढंग से कहा जाय तो व्यक्ति और समाज पर उसक प्रभाव निश्चित रुप से पडता है । ये सूक्तियाँ अर्थान्तरन्यास अलङ्कार ही हैं।

सस्कृत-साहित्य की प्रत्येक विधा सूक्तियों से समृद्ध है। काव्य, नाटक, कथा एवं आख्यायिका में प्रचुर मात्रा में सूक्तियो का प्रयोग मिलता है। वस्तुतः ज्ञानी पुरुषों एव कवियों की वाणी से उद्भूत निष्कर्ष कथन ही सूक्तियों का रुप धारण कर लते हैं।¹ संस्कृत साहित्य में जीवन, जगत, समाज, राजनीति, भौतिक द्वन्द्वों, भाग्य, पुरुषार्थ, सज्जन, दुर्जन, मित्र, अमित्र, आदि विविध विषयों से सम्बन्धित सूक्तियों का प्रयोग देखा जा सकता है। जीवन के हर क्षेत्र पर इन सूक्तियों का प्रभाव देखा जा सकता है।²

शुकसप्तति में प्रचुर मात्रा मे सूक्तियों का प्रयोग हुआ है। कवि ने अपने कथन को अधिक प्रभावशाली एव शिक्षात्मक बनाने के लिये प्रायः प्रत्येक कथा के अन्तर्गत शुक के माध्यम से सारगर्भित कथनों का प्रयोग किया है। इस ग्रंथ में सूक्तियों की विविधता दर्शनीय है। मदनविनोद की पत्नी प्रभावती को कुमार्ग पर जाने से बचाने के लिये अनेक उपदेशात्मक, व्यवहारिक, नैतिक-आदर्शों से युक्त सूक्तियों का प्रयोग


1 'महापुरुषो की वाणियों मे अद्भुत शक्ति होती है। कठिनाई के समय और कर्तव्यगत द्वन्द उपस्थित होने पर ये सूक्तियाँ प्रकाश और प्रेरणा देती हैं। ससार की समृद्धि भाषाओं में सूक्तियों का बड़ा मान है।'
हजारी प्रसाद द्विवेदी
रमाशंकर गुप्त संग्रहीत "सूक्ति सागर", भूमिका पृ० 7, 1959
2 विधाता की मानव सृष्टि में सूक्तियाँ कल्प-तरु के समान हैं। उनकी सुविस्तृत सघन-छाया में जीवन-पंथ की थकान को ही दूर करने की शक्ति नहीं है, प्रत्युत भविष्य की दुर्गम-यात्रा को सुखपूर्वक समाप्त करने का इनमें अक्षय तथा दैवी सम्बल भी रहता है। किं बहुना, मानव-मन की कोई ऐसी अज्ञात दिशा अथवा अँधेरी गली नहीं है, जिसमें इन सूक्तियों के शुभ्र किरणों का प्रकाश न पड़ता हो। सुख-दुख, विपत्ति, अनुराग-विराग, सज्जन-दुर्जन, योग-भोग, प्रशंसा-निन्दा से भरे इस द्वन्द्वात्मक जगत में इन सूक्तियों की गति सर्वत्र है। ब्रह्मा की भाँति ये सर्वव्यापी बन गई हैं।
राम प्रताप शास्त्री, रमाशंकर गुप्त संग्रहीत-
'सूक्ति-सागर' पृ० 10, 1959

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