शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextअविश्वस्त पर विश्वास न करें, विश्वास पर भी विश्वास न करें, क्योंकि विश्वास से उत्पन्न भय समूल विनष्ट कर देता है।¹
बिना दूसरों के मर्मस्थल का छेदन किये, बिना दुष्कर कर्म किये, बिना किसी को मारे, मत्स्यघाती (मछुआ) की भाँति कोई महालक्ष्मी को नहीं पाता है।²
भूखा क्या पाप नहीं करता? भूख से पीड़ित जन निष्करुण हो जाते हैं। ये जीवन के लिये (पाप–कर्म) करते हैं। सज्जनों का जो मत (पुण्य–कर्म) है वह इन्हें मान्य नहीं हैं।³
हे भीरु! प्राणियों की बुद्धि बलवती है, पराक्रम नहीं। (जैसे) अल्प बल वाले शशक ने पराक्रमी सिंह को मार डाला।⁴
राजन ! प्रिय बोलने वाले पुरुष तो सदा सुलभ होते हैं किन्तु अप्रिय तथा हित की बात कहने वाला और सुनने वाला ये दोनों दुर्लभ होते हैं।
व्यवहारिक सूक्तियो के अतिरिक्त इस कथा–ग्रन्थ में उपदेशप्रद सूक्तियों की भी अनुपम छटा दर्शनीय है। यथा–
1
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमुत्पन्न मूलादपि निकृन्तति।।
शुकसप्तति, श्लोक स० 120, पृष्ठ स० 105
2
नाभित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दुष्करम्।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम्
शुकसप्तति, श्लोक सं० 156, पृष्ठ सं० 125
3
बुभुक्षितः किं न करोति पाप क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति।
प्राणार्थमेते हि समाचरन्ति मतं सता यन्न मत तदेषाम्।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 59, पृष्ठ सं० 45
4
बुद्धिर्बलवती भीरु सत्त्वानां न पराक्रमः।
शशकेनाल्पसत्त्वेन हतः सिंह पराक्रमी।।
शुकसप्तति, श्लोकस० 178, पृष्ठस० 147
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