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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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दुष्टों का दमन करना तथा शिष्टजनो का पालन करना राजा का धर्म है—इससे उसे स्वर्ग मिलता है।

यतो बालकादपि हितं वाक्य ग्राह्यम्।¹

बालक से भी हितवाक्य ग्रहण करना चाहिए।

विद्वद्भिर्विपद्यप्युच्चैः स्थातव्यम्।²

विद्वानो को विपत्ति में भी प्रसन्न रहना चाहिये।

परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।³

राजा के बिना मनुष्य की कहीं पूंजा (सक्रिया, प्रतिष्ठा) नहीं होती।

यतो जनो धनमित्राः।⁴

धन के होने से ही उसके सब मित्र बनते हैं।

यतो हीनपुण्यो बुद्ध्या मुच्यते।⁵

जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है उसे बुद्धि छोड़ देती है।

पित्रार्जित द्रव्यं भोगिनं कं न करोति।⁶

पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता।

एकोऽपि त्वदीयः सुतः श्लाघ्यः।⁷

तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।


1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 22.
2 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 31.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 34.
4 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 43.
5 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 49.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 52.
7 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 120

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