शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextदुष्टों का दमन करना तथा शिष्टजनो का पालन करना राजा का धर्म है—इससे उसे स्वर्ग मिलता है।
यतो बालकादपि हितं वाक्य ग्राह्यम्।¹
बालक से भी हितवाक्य ग्रहण करना चाहिए।
विद्वद्भिर्विपद्यप्युच्चैः स्थातव्यम्।²
विद्वानो को विपत्ति में भी प्रसन्न रहना चाहिये।
परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।³
राजा के बिना मनुष्य की कहीं पूंजा (सक्रिया, प्रतिष्ठा) नहीं होती।
यतो जनो धनमित्राः।⁴
धन के होने से ही उसके सब मित्र बनते हैं।
यतो हीनपुण्यो बुद्ध्या मुच्यते।⁵
जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है उसे बुद्धि छोड़ देती है।
पित्रार्जित द्रव्यं भोगिनं कं न करोति।⁶
पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता।
एकोऽपि त्वदीयः सुतः श्लाघ्यः।⁷
तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।
1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 22.
2 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 31.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 34.
4 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 43.
5 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 49.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 52.
7 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 120
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