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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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अपेक्षा ब्राह्मण ग्रन्थो और आरण्यको में कथा, आख्यान एवं आख्यायिका का एक स्वस्थ दृष्टिकोण पनपता हुआ दिखाई देता है।

वैदिक साहित्य के अन्तिम भाग उपनिषद ग्रन्थों में कथा-साहित्य की मूल सम्पदा छिपी हुई प्रतीत होती है। फिर भी उपनिषदों के इस कथावतरण का मूल उद्देश्य साहित्य की अभिवृद्धि न होकर उससे सर्वथा भिन्न अध्यात्म चिन्तन है। इन कथाओ में भारतीय कथा-साहित्य का संवर्धन करने योग्य विशेषतायें भले ही विद्यमान न हों, किन्तु तत्कालीन जीवन के मुख्य आधार, ऋषि, मुनि, ब्रह्मचारी, पुरोहित और राजा आदि को पात्रो के रूप मे देखकर उन कथाओं की पवित्रता पर बड़ी आस्था होने लगती है। परमात्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष-ज्ञान, यश, मृत्यु आदि विषयों पर आधारित उपनिषद् ग्रन्थों की ये कहानियाँ मनोरञ्जन की दृष्टि से भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

'रामायण' और 'महाभारत' की अवतारणा से ज्ञान के क्षेत्र में दो विभिन्न युगों का सूत्रपात हुआ, पौराणिक युग और महाकाव्यों का युग। 'रामायण' और 'महाभारत' भारतीय साहित्य के दो वृहद् विश्वकोश हैं। 'रामायण' की अपेक्षा 'महाभारत' में ऐसे प्रचुर तत्व विद्यमान हैं। बाल्मीकि और व्यास से भी बहुत पहले राम-रावण और कौरव-पांडवों की कथायें बिखरी हुई थीं। इन कथाओं ने तत्कालीन नट-नर्तक, सूत और कुशीलवों द्वारा सारे समाज में प्रचलित उक्त कथाओं का संशोधन करके रामकथा और पाण्डव-कथा का एक साहित्यिक भव्य रूप उपस्थित किया। 'महाभारत' की सैकड़ों कथायें, आख्यायिकायें और आख्यान इस बात की पुष्टि करते हैं कि उस समय तक कथा-साहित्य का अपना एक विशिष्ट स्थान बन चुका था।

पौराणिक युग ने कथा-साहित्य को अधिक लोकब्यापी बनाया। पुराणों की कथाओं का अस्तित्व बहुत समय तक समाज में मौखिक रूप से बना रहा और इसीलिए एक ओर तो उनमें प्रक्षेप जुडे और दूसरी ओर उनके स्वत्व पर स्वतंत्र दन्त

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