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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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''कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना''

(क) काव्य-विभाजन में कथा का स्वरूप एवं स्थान :

(1) काव्य का स्वरूप :

काव्य शब्द 'कु शब्दे धातु से ण्यत्' प्रत्यय लगकर निष्पन्न होता है। काव्य के दो पक्ष हैं-(1) अनुभूति और (2) अभिव्यक्ति। कवि अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति के माध्यम से श्रोता, दर्शक या पाठक तक सम्प्रेषित कर उसे आनन्द मग्न करता है। अभिव्यक्ति के अनेक स्वरूप हो सकते हैं। यही कारण है कि साहित्य के अन्तर्गत काव्य एव काव्यशैलियों के अनेक रुप प्राप्त होते हैं। अनुभूतियों का ग्रहण नेत्रोन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय द्वारा होता है। इन्द्रियग्राहिता के आधार पर काव्यशास्त्रियों ने काव्य के दो भेद किये हैं-दृश्य एवं श्रव्य।¹

भरत ने दृश्य काव्य के पुनश्च दो भेद किये हैं-(1) रुपक (2) उपरुपक।

शैली के आधार पर श्रव्य काव्य के भी तीन भेद किये जा सकते हैं-(1) गद्य काव्य, (2) पद्य काव्य, (3) चम्पूकाव्य²।

कथा की अभिव्यक्ति प्राय. गद्य के माध्यम से होती आयी है किन्तु कभी-कभी उनमें गद्य के साथ पद्य का भी प्रयोग बहुतायत रुप में हुआ है।

(2) कथातत्व :

काव्य का वह अपरिहार्य तत्व है जिसके बिना काव्य रचना सम्भव नहीं है। कथातत्व काव्य का मूलाधार है। भारतीय वाङ्गमय में ही नहीं अपितु विश्व वाङ्गमय के अन्तर्गत किसी भी विद्या के ज्ञान हेतु चाहे वह दार्शनिक हो, साहित्यिक हो, अथवा भौतिक या अधिभौतिक हो कथा तत्व का आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार साहित्य की प्रत्येक विधा में कथा तत्व का होना अनिवार्य है। अतैव दशरूपक-कार रूपकों के प्रमुख तीन तत्व मानते हैं-


  1. "दृश्यश्रव्यत्व भेदेन पुनः काव्यंद्धिधा मतम्।
    दृश्यं तत्राभिनेयं तद्रूपारोपात्तु रूपकम्।।" ''नाट्यशास्त्रा''-32/385
  2. गद्यं पद्य च मिश्रं च तत् त्रिधैव व्यवस्थितम्।"-'काव्यादर्श'1/11.