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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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वामन कथा और आख्यायिका के भेद सम्बन्धी विचार को अधिक महत्व नहीं देते। उनके अनुसार काव्य के अन्य भेदों के सम्बन्ध में अन्य ग्रन्थों से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

आचार्य दण्डी कथा और आख्यायिका को पृथक भेद न मानकर दोनों को एक ही गद्यकाव्य का भेद स्वीकार करते हैं।¹

यद्यपि दण्डी के समय तक कथा और आख्यायिका ये दोनों विधायें पृथक रूप में प्रतिष्ठित हो चुकल थल किन्तु दण्डी इसके विरूद्ध थे। अतः उन्होंने दोनों में नाम-मात्र का अन्तर बताकर उन्हें एक सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उनके द्वारा दिये गये विचार इस प्रकार हैं-

  1. आख्यायिका का वर्णन सिर्फ नायक करता है, किन्तु कथा का वर्णन नायक के अलावा अपर व्यक्ति भी कर सकता है। नायक द्वारा अपने गुणों का वर्णन करना दोषपूर्ण नहीं, क्योंकि वह भूतार्थ शंसी (व्यतीत घटनाओं का वर्णनकर्ता मात्र) होता है। अतः आख्यायिका का वक्ता नायक ही हो यह अनिवार्य नहीं। अन्य व्यक्ति भी उसका वक्ता हो सकता है। इसलिए वक्ता का भेद दोनों को पृथक करने में समर्थ नहीं हो सकता।²

  2. दण्डी के काल में यह धारणा थी कि आख्यायिका में ही कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन रहता है-कथा में नहीं।


.... "ध्वन्यालोक", तृ 30 पृ० 326-27.

1 ,, "तत्कथाख्यायिकेत्येका जातिः संज्ञा द्वयांकिता।
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति शेषाश्चाख्यान जातयः।। "काव्यादर्श" 1/28

2 ' 'इति तस्य प्रभेदौ द्वौ तयोराख्यायिका किल।।
नायकेनैव वाच्यान्या नायकेनेतरेण वा।
स्वगुणाविष्क्रिया दोषो नात्र भूतार्थशंसिन ।।
अपि त्वनियमो दृष्टस्तत्रान्यन्यैरूदीरणीत्
अन्यो वक्ता स्वयंचेति की दृग्वा भेदकारणम्।।'
"काव्यादर्श", 1/23-27.

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