शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in context(6) ग्रन्थ का महत्व : शुकसप्तति के इन 70 कहानियों में स्त्रियों के व्यभिचार सम्बन्धी कामशास्त्र द्वारा प्रथित उन तमाम चातुर्य का विश्लेषण कवि ने जिस चातुरी से प्रस्तुत किया है, संभवत. उतनी सरलता से अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। ये सम्पूर्ण कहानियाँ उपदेशपरक, रोचक, सरल गान में कहीं-कहीं पद्य में हैं। कुछ प्राकृत में भी पद्य समुपलब्ध हैं।
वस्तुतः इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक समावलोकन करने पर जिज्ञासु कोपबुद्धिजीवी अनुसंधान की पराकाष्ठा पर पहुंचने पर इस तथ्य को दावे के साथ प्रस्तुत करने के लिए पूर्णरुपेण परिपक्वास्था में प्राप्त होने पर एक निष्कर्ष पर अवश्य ही पहुंचता है, जो सारगर्भित एवं किसी देशकाल एवं परिस्थिति का जीता जागता वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करने मे समर्थ ही नहीं अपितु सिद्ध हो जाता है। प्राचीनकाल से आज तक विभिन्न काल-खण्डों, स्थान विशेष व विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार अनेक लोक-कल्याणकारी एव सचालक प्रकृति के समक्ष सहज ही दर्शित होते हैं। इन्ही काल-क्रमादि के परिप्रेक्ष्य में "शुकसप्तति" कथा का जन्म घटनाचक्र, वृहत कथाङ्ग शुक एवं सारिका के विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान की पारदर्शिता की उपयोगिता, उसकी आवश्यकता, हरिदत्त नामक सेठ की परिवारिक प्रतिकूलता, असहयोग जटिलता की समस्याओ से ग्रसित संकटकालीन परिस्थितियो के रुप में अपने अस्तित्व को लाना तथा उसका प्रचार-प्रसार एवं संज्ञान उपयुक्त ज्ञानियों, विज्ञानियों, कवियों तथा मीमासकों का ध्यान आकर्षित होना और समग्ररुप में लिपिबद्ध करके साहित्य में लाने की प्रबल आकांक्षा जिसका संचरण तत्कालीन इसका मूलाधार है। मुख्यतया अशिष्टता, अश्लीलता, साथ ही साथ नैतिकता का संयोग सदैव विद्यमान होकर इस ग्रन्थ को गुणाढ्य कृत वृहतकथा जो कि लोककथाओं का प्राचीनतम ग्रन्थ है उससे भी अग्रसर होता हुआ अद्यावतु हम सभी अपने लोक जीवन व्यवहार एवं परस्पर सम्बन्धों की श्रृंखला पर प्रदर्शित कर रहे हैं। कुल मिलाकर उपर्युक्त यह रचना संस्कृत साहित्य के कथा-साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय है।
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