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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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पर ऐसी बुद्धि रखती हो तो जाओ-इस प्रकार "कथा" का ही सर्वत्र प्रचुरता से प्रयोग होने के कारण यदि इन कथाओं को "कथा" ही कह दिया जाय तो अनुचित नहीं होगा।

(ग) शुकसप्तति पर अन्य ग्रन्थों का प्रभाव :

शुकसप्तति का रचयिता अन्य नैतिक आदर्शों का उपदेशक है। शुकसप्तति की प्रत्येक कथा समाज को नैतिक मूल्यों, नैतिक आदर्शों का उपदेश देने के निमित्त उपनिबद्ध की गई है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ग्रन्थकार ने इन कथाओं की रचना तो की है साथ ही अन्य ग्रन्थों से भी सहायता ली है। शुकसप्तति के अध्ययन के पश्चात् यह स्पष्ट होता है कि कवि पर अन्य ग्रन्थों का प्रभूत प्रभाव पड़ा जिसके अन्तर्गत लोक-कथाये, रामायण, महाभारत, किरातार्जुनीयम्, रत्नावली, कालिदास आदि प्रमुख हैं।

पुराणो का भी यथेष्ट प्रभाव शुक सप्तति पर देखा जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रचनाकार अपने आदर्शों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए एवं उसे और प्रभावशाली बनाने के निमित्त इन ग्रंथों के आदर्शस्थापक श्लोकों को उद्धृत किया है।

राज नियम का ज्ञान कराने हेतु ग्रन्थकार प्रभावती को शुक द्वारा उपदेश देने के माध्यम से हर पाठक को यह संदेश देताहै कि राजा का शरीर इन्द्र से ऐश्वर्य, अग्नि से तेज, यम से क्रोध, कुबेर से वित्त, राम एवं कृष्ण से बल एवं दृढ़ता लेकर रचा जाता है।¹ राजा के देवत्व स्वरूप का वर्णन "भुयोभूयः" वैदिक वाङ्गमय में दिखाई पड़ता है। राजा देवताओ का अंश होता है इसीलिए उसके लिए देव सम्बोधन का प्रयोग परवर्ती साहित्य में किया गया है। स्पष्ट है कि ग्रन्थकार पर वैदिक वाङ्गमय का प्रभाव था।


¹ इन्द्रात्प्रभुत्वं ज्वलनात्प्रतापं क्रोधं यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञः क्रियते शरीरम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक स० 49, पृ० सं० 39

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