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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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वाले राम के द्वारा भरत के प्रति कहा गया यह श्लोक-लोभ नही करना चाहिए। इस आदर्श को व्यक्त करने के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।

सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।¹

श्रीरामचन्द्र जी कह रहे हैं। हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन-रहित भी मुझे सुखकर है।

कालिदास का प्रभाव :

शुकसप्तति के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि कालिदास का प्रभूत प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा है। यही कारण है कि नैतिक आदर्शों का कथन करने वाले कालिदास के कतिपय श्लोक शुकसप्तति में यत्र-तत्र उद्धृत किये गये हैं। मित्रता का आदर्श प्रस्तुत करने वाला कुमारसम्भव का निम्नलिखित श्लोक बिना किसी परिवर्तन के इस ग्रन्थ मे उद्धृत हुआ है।

"यतः सता सन्नतगात्रिसङ्गतं मनीषिभिः साप्तपदीनमुच्यते।।"²

कुमारसम्भव महाकाव्य में ब्रह्मचारी वेश धारण किए शिव ने पार्वती से कहा है- हे (स्तनों के भार से)! झुके शरीर वाली, मनीषियों ने कहा है कि सज्जनों के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

हर्षदेव का प्रभाव : '

महाराज हर्षदेव की रचनाओं का यथेष्ट प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा। महाराज श्री हर्षदेव का समय छठीं शताब्दी के आस-पास माना जाता है। हर्षकृत रत्नावली के निष्कम्पक के अन्तर्गत वर्णित निम्नलिखित श्लोक को हू-ब-हू रूप में इस ग्रन्थ में


1 शुकसप्तति श्लोक सं० 314, पृष्ठ स० 263.
2 शुकसप्तति पृष्ठ सं०-265 (कुमारसंभव पञ्चम अंक)

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