शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
Page 61 of 208
Read in contextसकती है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारण प्रस्तुत की जा सकती है कि शुकसप्तति भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है। शुकसप्तति का मूलस्वरूप भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक रहा होगा किन्तु निश्चित रूप से निर्णायक रूप में कुछ नहीं कहा जा सकता है।
(2) आधार कथा :
कथा सहित्य में शुकसप्तति 70 कहानियों का एक ऐसा संग्रह है जिनमें तरह-तरह की समस्याओ के हल प्राप्त होते हैं। इस संग्रह में सम्पूर्ण कथायें उपदेशप्रद ही हैं यह सर्वथा सत्य नहीं है जैसा कि संग्रह की आधार कथा से लगता है।
चन्द्रपुर नाम के नगर में विक्रमसेन नाम का राजा रहता था। उसी नगर में हरिदत्त नाम का सेठ रहता था। उसकी पत्नी का नाम श्रृंगार सुन्दरी था उसके पुत्र का नाम मनदविनोद था और पुत्रवधू प्रभावती थी जो सोमदत्त नामक सेठ की पुत्री थी।
यथा नाम तथा गुणः के आधार पर यह मदनविनोद अपना सारा समय अपनी युवती पत्नी के प्रेमालाप में ही व्यतीत कर देता था और पिता की शिक्षा का अपमान करता था। जुआ, मृगया, वेश्या, आदि में निरन्तर आसक्त रहता था। कुमार्गगामी इस पुत्र से पिता हरिदत्त सपत्नीक दुःखी रहता था। उन्हें दुःख से पीड़ित देखकर हरिदत्त का मित्र त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण ने अपने घर से नीतिकुशल शुक एवं सारिका उपहार में भेट किया और यह कहा कि तुम्हारा प्रस्तुत दुःख इनसे दूर हो जायेगा। इन शुक सारिकाओं को ग्रहण कर हरिदत्त ने अपने पुत्र मदन विनोद को दे दिया। जिन्हें अपने शयन कक्ष में पिंजड़े में स्थापित कर उसने पालन-पोषण किया।
एकबार एकान्त में शुक ने मदन विनोद से कहा-हे मित्र! 'तुम्हारे व्यसन आसक्ति से दुःखी तुम्हारे माता-पिता के आँखों से जो अस्रु समूह निरन्तर भूमि पर
[ 50 ]