शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextहुआ। उस स्त्री ने (ऐसा देखकर) निरीह पक्षी के हत्यारे उस तपस्वी को फटकारा और कहा- 'तेरे क्रोध ने उस बगुली को जला दिया, पर मेरा वह कुछ नहीं कर सकता है।'
उस स्त्री से गुप्त पातक जान लिये जाने के कारण वह डर गया और विस्मित हुआ। (गुप्त पातक जाने लेने का रहस्य पूछने पर) उस स्त्री ने उसे धर्मव्याध नामक मांसविक्रेता के पास वाराणसी नगरी में भेजा। वहाँ पहुँचने पर धर्मव्याध ने शुभागमन के विषय में पूछकर अपने घर ले जाकर, अपने माता-पिता को भक्ति के साथ भोजन देकर, तत्पश्चात् उसे भोजन दिया। उसके बाद उसने व्याध से ज्ञान का कारण पूछा- 'वह सती कैसे ज्ञानवती है और तुम कैसे ज्ञानवान हुये?' उस धर्मव्याधस ने कहा-
जो उत्तम, मध्यम, अधम सभी प्रकार के विकारों से अनासक्त रह, अपने कुलक्रममागत धर्म का पालन भलीभाँति करता है, जो सदा माता-पिता की सेवा करता है वह साधारण मनुष्य भी सच्चा गृहस्थ है, वही मुनि, साधु, योगी, और धार्मिक है।¹
मैं और वह सती इस प्रकार से ज्ञानी हुये है। तुम अपने माता-पिता का परित्याग कर घूम रहे हो, मुझे तुम ऐसे व्यक्तियों से सम्भाषण नहीं करना चाहिए किन्तु अतिथि समझकर मैने तुमसे बात की।
इस प्रकार कहने पर उस ब्राह्मण ने धर्मव्याध से अपने कर्तव्य तथा गुरूजन महिमा के सम्बन्ध में पूछा। उसने कहा-
जो अपने पूज्य जन की पूजा नहीं करते, जो अपने मान्यजन का सम्मान नहीं करते वे संसार में निन्दित होते हुए जीते हैं और मरने के बाद स्वर्ग नहीं जाते हैं।²
1 निजान्वयप्रणीत यः सभ्यग्धर्मं निषेवते।
उत्तममाधममध्येषु विकारेषु पराङ्मुखः।।
स गृही स मुनिः साधुः स च योगी स धार्मिकः
पितृशुश्रूषको नित्यं जन्तुः साधारणश्च यः।।
— शुकसप्ततिः, श्लोक सं०, 3, 4,, पेज सं० 5
2 न पूजयन्ति ये पूज्यान्मान्यान्न मानयन्ति ये।
जीवन्ति निन्द्यमानास्ते मृताः स्वर्गं न यान्ति च।।
— शुकसप्ततिः श्लोक स० 5, पेज पृष्ठ 6
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