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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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वह विषकन्या एक दिन अपने पति गोविन्द से बोली मैं तुम्हारे साथ अपने पिता के घर चलूँगी तब गोविन्द बैलगाड़ी पर भार्या समेत चल पड़ा। जाते समय मार्ग मे एक युवक, वक्ता, रूपवान और शूर विष्णु नामक ब्राह्मण मिला। ब्राह्मण और विषकन्या मे परस्पर अनुराग हो गया। कहा गया है कि अन्य धनुर्धारियों को अपने सामने न ठहरने देने वाला वीर कामदेव सर्वोत्कृष्ट है जिसके पुष्पशरों के लगने से, प्रथम प्रिय के दर्शन आदि से अनुराग उत्पन्न होता है, तदन्तर क्रमशः प्रिय से मिलने का मनोऽभिलाष, निद्राभङ्ग, शारीरिक दौर्बल्य, अपने-अपने व्यापरे में इन्द्रियों का आलस्य, प्रिय के अतिरिक्त अन्य विषयों में मन की विरक्ति, लज्जा का छूट जाना, उन्माद, मूर्छा और मरण इन दस दशाओ को सारा जगत प्राप्त होता है।¹

वह पथिक पति पत्नी को खूब सुपारी पान देता, इस प्रकार उस मूर्ख ब्राह्मण ने उस विष्णु पर विश्वास कर लिया और मेरे विषय में कहीं इसका पत्नी में अत्यन्त अनुराग है ऐसा न सोचने लगे। इस भय से स्वयं उतरकर उस ब्राह्मण को गाड़ी का चालक बना दिया। पति के वृक्षों के आड़ में आ जाने पर विष्णु ने मोहिनी का भोग किया और अपने अधीन बना लिया। पति गोविन्द के आ जाने पर 'तुम चोर हो' यह कहकर विष्णु ने उसे गाडी पर चढ़ने से रोक दिया और मोहनी को ग्रहण कर गोविन्द पर आक्रमण कर दिया। विषकन्या के प्रभाव से गोविन्द विष्णु से पराजित हुआ। तब मार्ग के समीपवर्ती गाँव में जाकर गुहार लगाने लगा कि चोर ने मेरी पत्नी को ग्रहण कर लिया है।


1 प्रीतिः स्याद्दर्शनाद्यौ. प्रथममथ मनःसङ्गसङ्कल्प भावो,
निद्राच्छेदस्तनुत्वं वपुषि कलुषता चेन्द्रियाणां निवृत्तिः ।
हीनाशोन्मादमूर्छामरणमिति जगद्यात्यवस्था दशैताः
लग्नैर्यत्पुष्पबाणै स जयति मदनः सन्निरस्तान्यधन्वी।
शुकसप्ततिः, श्लोक स०-28, पृष्ठ स०- 225-26

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