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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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तब उसके पति ने आकर उसे वृक्ष से धीरे-धीरे उतार कर उसके घर भेज दिया और वह धूर्ता (शोभिका) ताली बजाकर हंसने लगी।

कथा-13

‘‘वणिक् पत्नी राजिका की कथा’’

नागपुर नामक स्थान पर एक वणिक् रहता था। उसकी पत्नी राजिका बड़ी सुन्दर और दुराचारिणी थी। बनिया उसे परपुरूष में आसक्त नहीं जानता था। एक दिन उसने मार्ग में जाते हुए, संकेत किये हुए उपपति को देखा। उसे देखकर ‘घर से आज घी नहीं है? ऐसा कहकर घी के बहाने घर से निकलकर बाहर उपपति के साथ देर तक रही। पति घर में भूख से परेशान और क्रुद्ध था।

वह हाथ पैर और मुँह धूलिधूसर कर मुद्रा समेत धूलि लेकर घर आयी। क्रुद्ध रक्त नेत्र पति ने कहा- यह क्या?

दुःख की साँस छोड़ती तथा रोती हुई उसने धूल का ढेर दिखाकर कहा जिसके लिए तुम क्रुद्ध हो वह तुम्हारा द्रव्य इस धूल में गिर गया। इसे पछोर कर ले लो।

इस प्रकार कहने पर लज्जित उसने उसके अङ्गों को वास्त्राञ्चल से पोंछकर विविध लाड़-प्यार से शान्त किया।

कथा-14

‘‘धनश्री और उसके वेणीदान की कथा’’

शुक ने कहा- पद्मावती पुरी है। वहाँ धनपाल नामक वणिक् था। उसकी पत्नी धनश्री उसे प्राणों से भी प्रिय थी। (कुछ समय बीतने पर) एक दिन वह वणिक् रूपये-पैसे लेकर पत्नी से पूछकर विदेश चला गया। उसके चले जाने पर वह घर में मृत सी पड़ी रहती थी।


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