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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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जब बन्धुओं ने वाणिक् की पत्नी से पूछा तो उल्टा उसने पति को ही परस्त्रीगामिनी बताया और कहा कि यह मुझे मिथ्या कलंकित कर रहे हैं।

तब सभी ने मिलकर यह योजना बनायी कि इन दोनों में से जो भी आज से बाहर सायेगा, वही अपराधी होगा। इस तरह सहमति होने पर भी वह सोते पति को छोड़कर बाहर चली गयी। उसके जाने पर पति दरवाजा बन्द करके सो गया। जब वह रतिक्रीडा करके आयी और पति ने दरवाजा नहीं खोला तो वह कुएँ में एक भारी पत्थर फेककर दरवाजे के पास खडी रही। पति ने सोचा कि कुएँ में गिर गयी होगी ऐसा समझकर द्वार खोलकर बाहर निकला तो वह तुरन्त अन्दर जाकर दरवाजा बन्द कर ली। तब पति भी बाहर खड़ा होकर 'हा प्रिये' ऐसा कहते हुए जोर-जोर से रोने लगा। तब पत्नी भी रहस्य खुल जाने के भय से बाहर निकलकर पति को अन्दर ले गयी और दोनों ने आपस में समझौता करते हुए इकरार किया कि आज से हम दोनों एक दूसरे पर दोषारोपण नहीं करेंगे।

कथा-17

"गुणाढ्य ब्राह्मण की कथा"

विशाला नगरी में यायजूक नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी पाहिनी सुरूप और अत्यन्त प्रिय थी। पिता ने अपने पुत्र को क्रमशः समस्त विद्यायें ग्रहण करायीं। कतिपय दिनों बाद वह माता-पिता को त्यागकर विदेश चल गया और गुणाढ्य नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने जयन्ती नगरी में बुद्धि से जीवकोपार्जन करने को सोचा और एक बैल का यव, काश आदि से पालन किया।

उस बैल को बन्धन युक्त कर वह बनजारा वेश धारण किये, मदना वेश्या की कुट्टिनी से बोला-कि माल लादे हुए हमारे बैल को जहाँ बांधने का स्थान मिलेगा वहीं मैं सो जाऊँगा।

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