शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextतब ग्रामवासियों ने इस बात को सच मानकर उसका वस्त्र दिला दिया और वह लज्जा से कुछ न बोल सकी।
कथा- 35
"शम्बक वणिक् की कथा"
प्राचीन काल मे एक गाँव में शम्बक नामक बनिया तिल खरीदता था वह सरग्राम में बर्तन बेचने वाले बनियाँ के घर गया किन्तु वह घर पर नहीं था। इसी बीच उसकी पत्नी और शम्बक के बीच परस्पर प्रीति हो गयी। उसने उसे अंगूठी देकर उसका उपभोग किया। रतिक्रिया के बाद वह अपनी अँगूठी वापस मांग रहा था किन्तु अँगूठी न पाने पर वह बाजार में तिल विक्रेता व्यापरी के पास जाकर बोला-सौ प्रस्थ तिल मुझे दो जिसका मैं बयाना दे चुका हूँ।
यह सुनकर वह बोला कौन सा तिल? तुम कौन हो? कैसा बयाना? उसने कहा-प्रस्थ का परिमाण दूना बढ़ा देने के निमित्त तुम्हारी स्त्री बयाना में अंगूठी ले चुकी है।
इस प्रकार ऐसा सुनने पर रूष्ट होकर पत्नी के पास अपने पुत्र को भेजकर कहलवाया कि तुम्हारे इस प्रकार के व्यवहार से घर नष्ट हो जायेगा।
तब पुत्र ने अँगूठी लेकर तिल बिक्रेता के हवाले कर दिया, अर्थात वह धन जैसे आया था वैसे ही चला गया।
कथा- 36
"नायिनी की रावडी की कथा"
सरड नामक गाँव में शूरपाल ग्रामाध्यक्ष रहता था। उसकी पत्नी नायिनी अपने पति से नित्य रेशमी चोली माँगती। तब उसके पति ने कहा हम लोग तो सूती वस्त्र ही पहनते हैं रेशमी सूत की बात भी हमारे घर में कोई नहीं जानता।
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