शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextजब उसके पास तुलामात्र धन रह गया, तब वह दूसरे बनियाँ के घर तुला रखकर विदेश चला गया। वहाँ धन कमाकर अपने नगर को आकर उस बनिये से तराजू माँगी। बनिये से तराजू नहीं मिली। तराजू के लोभी उस मूर्ख बनिये ने उत्तर दिया कि तुम्हारी तराजू चूहे खा गये। ऐसा सुनकर वह चुप हो गया।
एक दिन वह भूधर उसके घर भोजन के लिए गया और उसके खेलते बालक को देखकर गुप्तरिति से अपने घर ले आया। बालक का पिता कुटुम्ब समेत दुःखी होकर रोने लगा। तब किसी पडोसी ने उसे बताया कि तुम्हारे पुत्र को भूधर ले गया है।
पुत्र माँगने पर भूधर ने कहा! मित्र! तुम्हारा पुत्र मेरे साथ नदी के तट पर स्नानार्थ गया, वहाँ बाजपक्षी ने उसका अपहरण कर लिया।
यह सुनकर बनियाँ राजा के पास गया और पुत्र हरे जाने का मामला बताया। भूधर भी वहाँ गया।
तब राजा के सामने मन्त्री ने जब भूधर से पूछा तो उसने कहा देव! जहाँ लौहनिर्मित तराजू चूहे खा सकते हैं, वहाँ बाजपक्षी हाथी को हर सकता है, फिर एक बालक के हरे जाने में क्या आश्चर्य है?
यह वचन सुनकर मन्त्री ने कहा- जब यह धूर्त तुम्हारी तराजू दे तो पुत्र भी देना अन्यथा नहीं।
उसने पुत्र दे दिया। तुलाग्राही ने दण्डित हो तराजू दिया।
कथा- 40
"सुबुद्धि और कुबुद्धि की कथा"
नगर नामक नगर में सुबुद्धि और कुबुद्धि दो मित्र प्रसिद्ध थे। एक बार सुबुद्धि परदेश गया। कुबुद्धि ने मित्र की स्त्री को प्राप्त कर उससे सम्बन्ध स्थापित किया। जब सुबुद्धि धनार्जन कर विदेश से लौटा तब कुबुद्धि सुबुद्धि से कपटपूर्ण स्नेह दिखाने लगा। सुबुद्धि ने भी उसका सम्मान किया। कुबुद्धि ने उससे कहा-आपने कहीं कोई आश्चर्य देखा?
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