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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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गले की गाँठ फूट गई। उसके फूट जाने पर राजपुत्री को आराम हो गया और राजा से धनराशि पाकर कृतार्थ होकर ब्राह्मण अपने घर चला गया।

कथा- 42

"व्याघ्रमारी और सिंह की कथा"

देउल ग्राम में राजसिंह नाम का राजपूत था। उसकी पत्नी कलहप्रिया अपने पति से झगड़ा करके अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर पिता के घर चली गयी। क्रोधवश वह अनेक नगरो तथा वनो को लाँघती हुई मलयगिरि के समीप महावन में पहुँची।

वहाँ पर बाघ को अपनी ओर आता देखकर निर्भयतापूर्वक उसने दोनों पुत्रो को तमाचा मार कर कहा- तुम दोनों एक अकेले बाघ को खाने के लिए क्यों लड़ाई कर रहे हो? इस एक ही को पहिले बाँट कर खा लो। इसके बाद जब दूसरा दिखाई पड़ेगा तब खाना।

ऐसा सुनकर सिंह ने उसे बाघ मारने वाली स्त्री समझकर भय से आकुलचित्त होकर भाग गया।

कथा- 43

"व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा"

वन में भयातुर उस बाघ को भगा हुआ देखकर पशुओं में धूर्त शृगाल ने कहा-कि भय से बाघ भगा हुआ है।

बाघ ने शृगाल से कहा कि तुम भी किसी गुप्त स्थान को चले जाओ, क्योंकि जिस व्याघ्रमारी को शास्त्र मे सुनते है वही मुझे मारने जा रही थी कि मैं जान बचाकर शीघ्र ही उसके आगे से भागा।

जम्बुक ने व्याघ्र से कहा स्वामिन्! वह धूर्त स्त्री जहाँ है वहाँ चला जाय, यदि वहाँ चलने पर तुम्हारे सामने भी वह देखे तो आप अपनी शर्त के अनुसार मेरा वध कर दें।

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