BharatKosha
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished276 pages

Page 132 of 276

Read in context
Page 132

११८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ तथा चोक्तं कावषेयगीतायाम्— “त्यक्त्वा सर्वविकल्पांश्च स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । कृत्वाऽशान्तो भवेद्योगी दग्धेन्धन इवानलः ॥” तथा च श्रीविष्णुपुराणे— “तस्यैव कल्पनाहीन- स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते ॥” (६ । ६ । ९२) इति ॥ १२ ॥ ऐसा ही कावषेय गीतामें भी कहा है—“योगी सम्पूर्ण विकल्पों- को त्यागकर मनको अपने आत्मामें निश्चलरूपसे स्थिर कर जिसका ईँधन जल चुका है उस अग्निके समान शान्त हो जाता है ।” तथा श्रीविष्णुपुराणमें कहा है— “उस ध्येय परमेश्वरका ही जो मनके द्वारा ध्यानसे सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन ( ध्याता, ध्यान और ध्येयके भेदसे रहित ) स्वरूप ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं ॥१२॥ प्रणव-चिन्तनसे ब्रह्म-साक्षात्कारका दृष्टान्तोंद्वारा समर्थन इदानीम् “ओमित्येतेनैवाक्ष- रेण परं पुरुषमभिध्यायीत” (प्र० उ० ५ । ५) । “ओमित्यात्मानं युञ्जीत” (महानारा० २४ । १)। “ओमित्यात्मानं ध्यायीत” इति श्रुतेरात्मानमन्विष्य पराभिध्याने प्रणवस्य नियमादभिध्यानाङ्गत्वेन प्रणवं दर्शयति— अब “ॐ इस अक्षरसे ही परम पुरुषका ध्यान करना चाहिये” “ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्मचिन्तन करना चाहिये” “ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्माका ध्यान करना चाहिये” इत्यादि श्रुतियोंसे आत्मा- न्वेषण करके उसका ध्यान करनेमें प्रणवचिन्तनका नियम होनेसे श्रुति प्रणवको आत्मचिन्तनके अंगरूपसे प्रदर्शित करती है— वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्ति- र्नदृश्यते नैव च लिङ्गनाशः ।