श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in contextअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१ जिस प्रकार तिलोंमें तैल, दहीमें घी, स्रोतोंमें जल और काष्ठोंमें अग्नि देखे जाते हैं उसी प्रकार जो पुरुष सत्य और तपके द्वारा इसे वारम्बार देखनेका प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा आत्मामें ही दिखायी देता है ॥१५॥ तिलेष्विति । यन्त्रपीडनेन | 'तिलेषु' इत्यादि । जिस प्रकार | यन्त्रसे पेरनेपर तिलोंमें तैल दिखायी तैलं गृह्यते । दधिनि मथनेन | देता है, मन्थन करनेपर दहीमें घी सर्पिरिव । आपः स्रोतःसु नदीषु | देखा जाता है, पृथिवी खोदनेपर | स्रोत—अन्तःस्रोता नदियोंमें जल भूखननेन । अरणीषु चाग्निर्मथ- | दिखायी देता है और मन्थन करनेपर | काष्ठोंमें अग्निकी उपलब्धि होती है नेन । एवमात्मात्मनि स्वात्मनि | उसी प्रकार मननसे आत्मामें अपने गृह्यतेऽसौ मननेनात्मभूतदेहादि- | अन्तरात्मामें ही इस आत्माकी | उपलब्धि होती है, अर्थात् आत्मभूत ष्वन्नमयाद्यशेषोपाधिप्रविलापनेन | देहादिमें जो अन्नमयादि सम्पूर्ण | उपाधियाँ हैं उनका लय करनेपर निर्विशेषे पूर्णानन्दे स्वात्मन्येवा- | अपने निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप | आत्मामें ही इस ( परमात्मा ) का वगम्यत इत्यर्थः । | अनुभव होता है । केन तर्हि पुरुषेणात्मन्येव | अच्छा तो किस पुरुषको आत्मा- | में ही इस आत्माकी उपलब्धि होती गृह्यते ? इत्यत आह—सत्येन | है, सो अब बतलाते हैं—सत्यसे | अर्थात् यथार्थ और प्राणिमात्रके लिये यथाभूतहितार्थवचनेन भूत- | हितकर सम्भाषणसे, क्योंकि “जो हितेन । “सत्यं भूतहितं प्रोक्तम्” | प्राणियोंके लिये हितकर हो उसे सत्य | कहते हैं” ऐसी स्मृति है तथा मन इति स्मरणात् । तपसेन्द्रियमन- | और इन्द्रियोंकी एकाग्रतारूप तपसे, सामैकाग्र्यलक्षणेन । “मनसश्चे- | क्योंकि स्मृति कहती है “मन और