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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished276 pages

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४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें विद्यमान उस एक एकस्याखिलजन्तुषु ॥" आत्माके वृद्धि और क्षय नहीं होते।" (२।१३।७०-७१) "यत्त कालान्तरेणापि हे राजन् ! जो कालान्तरमें भी नान्यसंज्ञामुपैति वै। परिणामादिके कारण होनेवाली किसी परिणामादिसंभूतां अन्य संज्ञाको प्राप्त नहीं होती वही तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥" परमार्थ वस्तु है। ऐसी वस्तु [आत्माके (२।१३।१००) "यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि सिवा ] और क्या है ? हे नृपश्रेष्ठ ! मत्तः पार्थिवसत्तम । यदि मुझसे भिन्न कोई और पदार्थ तदैषोऽहमयं चान्यो होता तो यह, मैं, अमुक, अन्य वक्तुमेवमपीष्यते ॥ आदि भी कहना ठीक हो सकता यदा समस्तदेहेषु था। जब कि सम्पूर्ण शरीरोंमें एक पुमानेकेको व्यवस्थितः। ही पुरुष स्थित है तो 'आप कौन हैं ?' तदा हि को भवान्सोऽह- 'मैं वह हूँ' इत्यादि वाक्य वञ्चनामात्त्र मित्येतद्विप्रलम्भनम् ॥ हैं ! तुम राजा हो, यह पालकी है, त्वं राजा शिविका चेयं हम तुम्हारे सामने चलनेवाले वाहक वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको हैं और ये तुम्हारे परिजन हैं— न सदेतत्तवोच्यते ॥" यह तुम ठीक नहीं कहते।" (२।१३। ९०-९२) "वस्तु राजेति यल्लोके "व्यवहारमें जो वस्तु राजा है, जो यच्च राजभटात्मकम् । राजसेवकादि हैं और जिसे राजत्व तथान्ये च नृपत्वं च कहते हैं तथा इनके सिवा जो अन्य तत्तत्सङ्कल्पनामयम् ॥" पदार्थ हैं वे सब सङ्कल्पमय ही हैं।" (२।१३।९९) "अनाशो परमार्थश्च "अविनाशी परमार्थतत्त्वकी उपलब्धि प्राज्ञैरभ्युपगम्यते ।" (२।१४। २४) तो ज्ञानियोंको ही होती है।"

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