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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ९८ ) सिंहासनबचीसी.

अपने दिलमे जाना कि, अब यह मुझे मुकर्रर खायगा. इतनेमें सबेरा होगया. बाघ उठकर वहांसे चला गया. रींछने उसके कानो- में मूत दिया और कहा-तुझे जीते तो क्या मारूं ? क्योंकि, अब यहां तेरा कोई बचानेवाला नहीं है. इससे असमर्थ जानकर मैं तुझे छोड देताहूं. यह कहकर रींछ तो चला गया और वह गूँगा बहरा हो बहुत घबरा और व्याकुल हो घरमें आया. राजा उसकी दशा देख अपने जीमें चिंता करने लगा. महलोंमें यह खबर हुई तो रानियां कूक मार मार रोने लगी. और कहने लगी कि-भगवान्ने यह क्या अयुक्त किया. कोई कहने लगी कि-किसीने इसे छला है तिससे इसकी यह हालत हो गई है. तब राजाने सोचकर दीवानसे कहा कि-जितने गुणी लोग हैं मंत्र- यंत्र जाननेवाले अपने नगरमें उन सबको बुलाकर कुँवरको दिखलाओ. प्रधानने आदमियोंको भेज सब सयानोंको बुलाया और उनसे कहा-जिससे इसे आराम होय ऐसा काम किया चाहिये. तब वे अपने २ मंत्र यंत्र करने लगे. जिस कदर कि उन्होने उसका उतार किया परंतु कुछभी फायदा न हुआ. तब हारकर उनसबोंने जवाब दिया कि, हमारी विद्या यहां कुछ काम नहीं करती. जब मंत्रीने यह देखा कि-उन्होंके गुणोंसे उसे कुछ आराम न हुवा, तब राजासे हाथ जोड़ विनती किया कि-महाराज ! मेरे पुत्रकी बहू जो है सो बड़े गुणवती है. इस