सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
Page 106 of 190
Read in context( १०४ ) सिंहासनबत्तीसी.
तरह तरहकी तैयारियां कीं. जितने कुटुंबके लोग थे उन्होंको नये नये जोड़े पहिना अपने साथ ले जानेको तैयार हो रहा. नाच राग रंग खुशीसे होने लगे. इस तरह तमाम शहरकी जियाफत करते करते बरातकी तैयारी होरही. ब्याहका दिन नजदीक पहुँचा, अजबस कि जाना दूरका था फिक्र करने लगा कि अरसा थोड़ा रहा है. समुद्रपार इतने दिनोंमें हम क्योंकर जा सकेंगे ? यह बात सुनकर इसके सब भाई बंधु अंदेशा करने लगे और खुशी तमाम शादीकी भूलगये. इसमें एक शख्सने आकर उस सेठसे कहा कि-इस कन्याका प्रारब्ध होगा तो इस लग्नमें विवाह होगा. और मैं एक यत्न बताताहूं तुम इसकी फिक्र मत करों. भगवान् चाहे तो बनजाय. तब उसने हाथ जोडकर कहा कि-भाई ! यातो भगवानके हाथ हमारी लज्जा या तेरे हाथ जिससे हमारा काम बने सो कह ? वह कहने लगा-कई एक महीने हुए हैं कि-एक बढ़ई उडनखटोला बनाकर राजाके पास ले आयाथा और वह कहताथा कि; इस खटोलेका यह स्वभाव है कि, इसपर बैठकर जहां तुम्हारी इच्छा हो वहां जाओ, यह पहुँचावेगा. राजाने सुनकर उसको दो लाख रुपये दिये, और खटोला ले लिया. वह अब राजाके घरमें होवेगा इसवास्ते तुम राजाके पास जाओ और सब हालत राजासे कहो तो राजा वह खटोला देगा और तुम्हारा सब काम सिद्ध होजायगा.