सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
Page 111 of 190
Read in context( ११० ) सिंहासनबत्तीसी. खडा है और कहता है कि, मैं मर्त्यलोकसे आया हूँ, द्वारेका हजारों दंडवत् करता है, उसको आपके दर्शनकी अभिलाषा है. जिससे निहायत बेचैन है. यह बात सुनतेही शेषनाग उठके द्वारपर आये. राजाने देखतेही उनको साष्टांग प्रणाम किया और उन्होंने हँसकर आशीष दी और पूँछा कि-तुम्हारा नाम क्या है ? और कौनसा देश है ? तब राजाने हाथ जोड़कर कहा कि-स्वामी ! विक्रम भूपाल मेरा नाम है. मैं मर्त्यलो- कका राजा हूँ और आपके चरणके दर्शनकी मुझे इच्छा थी सो मेरे मनकी इच्छा पुरी हुई. आज मुझे करोड यज्ञका फल हुआ और करोड़ों रुपये-दान कियेका पुण्य पाया. और धन्य भाग मेरा जो आपके चरणकमलके दर्शन हुए. बल्कि चौंसठ तीरथ न्हायका मुझे फल हुआ. विक्रमका नाम सुनतेही शेष नाग उसको मिले और हाथ पकड़कर अपने मकानमें लेगया. अच्छी जगह बैठाकर क्षेम कुशल पूँछी. राजाने कहा-महाराजके दर्शनसे सब आनंद है. फिर शेषनागने कहा-तुम किस कारण यहां आयेहो ? और आते हुये पंथमें तुमने बहुत कष्ट पाया होगा. विक्रम बोले कि-फणिनाथ ! मैंने जो कष्ट पाया सो सब तुम्हारे दर्शन कियेसे निस्तरा. फिर राजाको रहनेके लिये एक अच्छा स्थान दिया और बहुतसे लोग टहल करनको. उन लोगोंसे कह दिया कि मेरी सेवासे भी तुम अधिक राजाकी सेवा जानना