सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context( १२४ ) सिंहासनबत्तीसी.
थी कि, लकड़ियां बनमेंसे लाता और बेंचकर खाता ! यह देखकर मैंने जो तेरा पाव देखा कोई अच्छा लक्षण न पाया और तू सारे नगरका राज करता है इससे मेरे जीमें क्रोध हुआ है. इससे अब घर जाकर ग्रंथ जला देश, त्याग करूंगा. राजाने कहा-ब्राह्मण ! सुन मैं तुझे बुलाकर कहता हूं और ग्रंथ साधकर तुझे दिखसाताहूं तब तेरा जी पतीआवेगा. किसीके लक्षण गुप्त होते हैं और किरासे प्रकट. तब ब्राह्मणने कहा- महाराज ! यह मैं किस तरहसे जानूं. तबही राजाने छुरी मँगवा तलुवोंकी खाल चीर लक्षण दिखला दिये. ब्राह्मणने देखा कि कमल और उर्ध्वरेखा है वह देखकर उसके जीको संतोष हुआ और कहा कि-हे कि विप्र ! ऐसी विद्या पढी हुई किस काम आती है कि जिसके सब भेद मालूम न हो इस तरहके लक्षण देख ब्राह्मण अवाक् हुआ. फिर राजाको आशीद दे अपने घरके गया. इतना किस्सा कह पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! कब इस योग्य तू हुवा ? जो सिंहासनपर बैठनेकी अच्छा करता है ? और जो इतना साहस करे सोही इस सिंहासनपर बैठे नाम, धर्म, यश आदमीके जानेसे नहीं जाता. जैसा फूल नहीं रहता और उसकी सुगंध अंतरमें रह जाती है. यह सुनकर राजाको कुछ चेत हुआ और कहने लगा कि, यह संसार स्थिर नहीं, जैसी तरूवरकी छाय है वैसीही दुनियाकी गति है. जिस