सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
Page 132 of 190
Read in contextकहने लगे कि, देखो इस ब्राह्मणने क्या मूर्खता की है. इस वेश्याको ये कपडे और तमाम जबाहिर एक आनमें बख्स दिया यह जातका भिखारी यहा हमारे आगे सखावत दिखाता है. तब राजाने खफा हो ब्राह्मणसे पूँछा कि-तू इसके किस गुणपर रीझा वह मेरे आगे बयान कर. ब्राह्मणने कहा-सुन, राजा ! तूभी मूर्ख है और तेरी सभाभी मूढ है. तेरी सभामें यह ऐसा गुण प्रकाश करे सोभी कोई नहीं जानता; क्योंकि इसके कुचपर भौंरा आन बैठाथा सो इसने अपनी श्वास रोक कुचकी राह निकाल उसे उड़ा दिया. यह इसका चतुरताका काम देख सब कुछ मैंने इसे बख्स दिया. माधवने जब यह बात कही तब राजा लज्जित हो बोला कि-इसी समय मेरे नगरसे निकलजा अब जो सुनूँगा कि तू इस नगरमें है तो मैं बँधवाकर दरियामें डूबा दूंगा, तब माधवने कहा, महाराज ! मुझसे ऐसा क्या- अपराध हुआ है ? जो आप मुझे देशसे निकाले देते हो. राजाने कहा, मैंने जो कुछ तुझे दियाथा सो तूने मेरेही आगे दान कर दिया. क्या मेरे पास देनेको कुछ तुझे न था, जो तूने दिया ? यह सुनकर माधव मनमें मलीन हो राजसभासे निकल बाहर जा एक वृक्षके नीचे व्याकुल खडा होकर अपने जीमें कहने लगा कि, माता बेटेको विष दे और पिता पुत्रको बेंचे और राजा सर्वस्व ले तो कोई शरण किसकी ले ? फिर कहने लगा