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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १३८ ) सिंहासनबत्तीसी.

और उस राजाको पत्र लिखा कि हम इस लिये आये हैं कि, तुम्हारे यहां जो कामकंदला वेश्या है उसे हमारे पास भेजदो. नहीं तो युद्ध करनेका सामान करो. यह पत्र लिख एक दूतके हाथ राजा कामसेनके पास भेज दिया राजाको खबर हुई कि, एक दूत राजा वीरविक्रमादित्यका खत लेकर आया है यह सुनतेही राजाने उसको सन्मुख बुलाया और उसने जा जुहार- कर खत राजाके हाथमे दिया. राजाने उस चिट्ठीको बाँचकर कहा कि, अच्छा कहो अपने राजासे कि चले आवे हम युद्ध करनेको तैयार .हुए हैं. दूतने आ राजासे कहा-महाराज ! वह लडनेको तयार है. तब राजाने भी हुक्म अपने लोगोंको दिया. हमाराभी दल तैयार हो फिर राजाके जीमें आया कि जिसके वास्ते हम आये है उसकी प्रीतिकी परीक्षा लिया चाहिये. इस तरह जीमें ठहराया, और आप वैद्यका स्वांग बन कामनग- रीमें गया और लोगों मकान कामकंदलाका पूंछ दरवाजे- पर जा वैद्य हकीम कर पुकारा. इनका अवाज सुनतेही एक दासी बाहर निकल आई और पूंछा कि तुम वैद्य हो तो हमारी नायकाका कुछ इलाज करो जो यह अच्छी होवेगी तो तुम्हें बहुतसे रुपये मिलेंगे. ये बातें कह दासी उससे विदा हो गई और वह उसके साथ कामकंदलाके सन्मुख गया राजाने देखा कि निर्जीव पडी है. राजाने उसकी नाडी देखकर कहा कि