सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextसिंहासनबत्तीसी. ( ११ ) इसमें किस्म किस्म और रंग रंगके जवाहर पैदा किये हैं. एक एक कदमपर दौलतका गंज है. और एक एफ कोसपर आबहयातका चश्म है, पर तुम कमवक्त हो इससे नहीं पहचाना अपने दिलमें क्या समझेहो ? तुम जैसे इस दुनियामें करोड़ों पड़े हैं तुमने इतनेहीमें मग- रूर होकर अपने ताईं भुला दिये. ओर यह जिसका सिंहासन है उस राजाके यहां तुमसा एक एक अदना नौकर था. यह सुनकर राजाको गुस्सा आया. और कहने लगा कि-इस सिंहासनको अभी मैं तोड़े डालताहूं. इतनेमें वररुचि पुरोहित बोला, राजा ! यह इनसाफसे दूर है, इसवास्ते पुतलीकी बात कान देकर सुन लो. और जो कछु करना हो सो फिर कल्लो. राजाने कहा तू इसका अहवाल कह. तब पुतली बोली-मैं क्या कहूं १ राजा । इतनाही सुन, तुम जलकर खाक होयगे और जब तमाम हकीकत उस राजाकी सुनोगे तब औरभी शरमिंदा होंगे. और अपने दिनोंको रोवो गे. लोगोंके आगेभी हल्के होओगे इसके कहवानेसे न कहना ना भला है हम तो उसी रोज मरचुकी थीं और सिंहासन फूट चुका था जिस रोजसे राजा विक्रमादित्यसे बिछुडीं. अब हम क्या डर है ? इतनेमें दिवान राजाका पुतलीसे कहने लगा-किसलिये तू अपने राजाको बयान नहीं करती ? गुस्सा छोडदे और अब बात कर. क्या वह भेद छिपा रखती है ? तब पुतली बोली कि-एक शकबंधी राजा बड़ा बली था. और नगर अंबावतीमें राज