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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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[Header: बाईसवीं पुतली २२. ( १४१ )]

राजाने हार मानी और कबूल किया कि, हम कामकंदलाको भेज देंगे. और यह जो हमने युद्ध किया सो आपके दर्शनके वास्ते किया है इसलिये कि किसीतरह हमारे नगरमें आपका चरण पड़े आगे राजासे मुलाकत करके वह राजा अपने मंदिरमे विक्रमादित्यको लेगया. और बहुत भेंट आगे धर कामकंद- लाको बुलाकर राजाके आगे खड़ी किया. और उसनेभी माधवको बुला कामकंदलाका हाथ पकड़ हवाले किया. फिर वहासे कूचकर अपने नगरमें आये और माधवको बहुत धन दौलत दे विदा किया. इतनी बातें कह अनुरोधवती पुतली बोली कि-हे राजा भोज ! इतनी सामर्थ्य और इतना साहस जो तुझमे हो तो सिंहासनपर बैठ नही तो पतित हो नरक भोग करेगा. पहभी दिन राजाका टल गया. दूसरे दिन वह फिर मौजूद हुआ तब अनुरेखा नाम्नी-

बाईसवीं पुतली-

बोली-कि हे राजा भोज ! तू अपने मनकी चिंता छोडदे और मैं जो तेरेसे कहतीहूं सो सुन. एक दिन राजा वीर विक्रमादित्य सभा कर बैठाथा और प्रधानसे पूंछा कि-मनुष्य बुद्धि अपने कर्मसे पाते हैं या उनके मातापिताके सिखानेसे पाते हैं ? यह सुनकर मंत्री बोला-महाराज ! यह नर पूर्वजन्ममें जैसा कर्म