सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextबाईसवीं पुतली २२. ( १४५ )
पृथ्वीनाथ ! दिनरात नगरका पहरा हम देते हैं. इसमें भी चोर आन चोरी करता है, बदनाम हम होते हैं. बिना अपराध कलंक लगे तो फिर कुशल काहेकी है ? राजाने फिर ब्राह्मणके बेटेको बुलाया. जब वह सन्मुख आया तब राजाने दंडवत् की. वो मंत्र पढ आशीष देने लगा. तब राजाने कहा आप कुशल क्षेमसे हैं ? उसने कहा महाराज ! आप पूंछते हैं मुझसे यह बात कि तेरे शरीरमें कुशल है सो कुशल कहांसे हो ? मेरे शरीरकी दिन बदिन उमर घटती है महाराज ! कुशल तो तब कहनेमें आवे कि मनुष्य चिरंजीव होवे जिसके जीवन मरण साथ है उसको क्या खुशी है ? चारोंकी चार बातें सुनकर दीवानसे कहा कि सच है. पढानेसे पंडित नहीं. पंडिताई जो कर्ममें लिखी हो तो मिलै यह कह दीवानके तईं सब प्रधानोंका सरदार किया और अपने राजका भार दिया. उन चारों लड़कोंके विवाह कर दिये. ओर बहुत धन दौलत दी इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! कलियुगमें ऐसा धर्मात्मा और साहसी राजा होना कठिन है जो इतनी बुजुर्गी और धन पाय अपनी कही बातका ख्याल- न करे और जो न्यायका धर्म था सोही कहे. ऐसा जो तू कर्म करे और इसके योग्य हो तो इस सिंहासनपर पाँव धर और नहीं तो अपनी यह आशा तज. यह पुतलीकी बातें सुन राजा अ पने मनमें चिंता करता हुआ वहांसे उठ मंदिरमें आया और १०