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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १४८ ) सिंहासनबत्तीसी. पुराने लोग आकर हाजिर हुआ करते और आपसमें चर्चा करते कि यह राजा बुद्धिमान है, जो राजको यों लिया और बंदोबस्त यों किया, कई दिनके बात उन लोगोंसे दीवानने कहा कि, तुम मेरेपास आया न करो इस लिये कि काम तो मेरे हाथ तुम्हारा निकलता नहीं और नाहकको राजा सुनेगा, तो खपा होगा कि, यह अपने घरमें क्या मता किया करते हैं ? इस वास्ते मैं अपनी बदनामीसे डरताहूं कुछ तुम मेरे इस कहनेका अपने मनमें बुरा न मानना. यह सुनकर उनमेंसे फिर कोई उसके पास न आया, यह अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा कुछ काम कीजिये जिसमें संतुष्ट हो रैनादिन यही विचार करता रहा था. एक दिन वह प्रधान नदीके किनार गया, वहां जाकर स्नान ध्यान कर कमरभर पानीमें खड़ा हुआ जप करताथा इसमें उसे नदीमे एक फूल अति सुंदर कि वैसा कभी दृष्टीमें न आया था बहता हुआ देखा. अपना जप छोड़कर आगे बढ़ फूल लेकर जीमें विचारा कि यह राजाको भेंट करूंगा तो वह देखकर बहुत खुश होवेगा, वह फूल हाथमें ले खुशी खुशी अपने घरमें आ कपडे दरबारके पहन राजाके पास गया, और फूल नजर किया. राजा फूल लेकर खुश बहुत हो बोला कि, अपने राज पाट‌का मैंने तुझे प्रधान किया, उसने उठकर भेंट दी और आदाब बजा‌लिया. फिर राजाने कहा इस फूलका वृक्ष मुझे लादे, और लादेगा तो मैं तुझसे बहुत खुश हूंगा और न लादेगा तो अपने नगरसे

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